क्या कह रहे हैं अखिलेश यादव
Akhilesh Yadav·
·
5 बड़ा या 7 ?
विधायक बड़ा या सांसद ?
राज्य बड़ा या केंद्र ?
राज्य सरकार का मंत्री बड़ा या केंद्र सरकार का?
फिर सवाल ये है कि 5 बार के विधायक को भाजपाई राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाते हैं और 7 बार के सांसद को राज्य का अध्यक्ष।
इसका तर्क क्या है… दरअसल इसका कोई तर्क भाजपा के पास नहीं है… इसका कारण सिर्फ़ ये है कि प्रभुत्ववादी भाजपाई ये संदेश देना चाहते हैं कि PDA समाज का व्यक्ति कितना भी क़ाबिल हो पर वो वर्चस्ववादियों के आगे एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता है।
भाजपा ने पीडीए समाज को नीचा दिखाने को लिए ये नया तरीका अपनाया है। ये अपमान पीडीए समाज अब और नहीं सहेगा… अब अपनी पीडीए सरकार बनाएगा, पीडीए को मान दिलाएगा।
"पी डी ए " की विचारधारा और उत्तर प्रदेश की राजनीती :
उत्तर प्रदेश विधानसभा में को नेता प्रतिपक्ष (LoP) बनाए जाने का निर्णय समाजवादी पार्टी (सपा) के "PDA" (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद कदम रहा है।
इस नियुक्ति और इससे जुड़े मुख्य विवाद निम्नलिखित हैं:
1. नियुक्ति और रणनीति (PDA बनाम ब्राह्मण कार्ड)
- अखिलेश यादव का दांव: लोकसभा चुनाव 2024 में PDA फॉर्मूले की सफलता के बाद, अखिलेश यादव ने एक ब्राह्मण चेहरे (माता प्रसाद पांडेय) को नेता प्रतिपक्ष चुनकर सबको चौंका दिया। इसे "P फॉर पंडित" रणनीति के रूप में देखा गया, जिसका उद्देश्य भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाना और यह संदेश देना था कि सपा सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है।
- वरिष्ठता और अनुभव: 82 वर्षीय माता प्रसाद पांडेय सिद्धार्थनगर की इटवा सीट से सात बार के विधायक हैं और दो बार विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता और सदन के नियमों की गहरी समझ को भी इस चयन का मुख्य कारण बताया गया।
2. PDA के सवाल पर उठे प्रमुख विवाद
इस नियुक्ति के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने सपा के PDA के दावों पर सवाल उठाए:
- मायावती (BSP) का हमला: बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि सपा ने लोकसभा चुनाव में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों का वोट तो लिया, लेकिन जब नेतृत्व देने की बारी आई, तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने इसे PDA समुदाय के साथ "धोखा" करार दिया।
- भाजपा की प्रतिक्रिया: यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी इसे पिछड़ों और दलितों के साथ विश्वासघात बताया। भाजपा का तर्क था कि अखिलेश यादव केवल वोट के लिए PDA का नाम लेते हैं, लेकिन उच्च पदों पर अपनों या सवर्णों को ही प्राथमिकता देते हैं।
- सपा का स्पष्टीकरण: अखिलेश यादव और माता प्रसाद पांडेय ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि 'A' (अल्पसंख्यक/अगुड़ा/आदिवासी) में सवर्ण और अन्य सभी शोषित वर्ग भी शामिल हैं। पांडेय ने स्वयं कहा कि वे लोहिया के समय से ही पिछड़ों और गरीबों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
- ने पर भी बड़ा राजनीतिक बवाल हुआ था। सपा ने इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया था।
संक्षेप में, माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति सपा के लिए जहाँ एक तरफ जातीय संतुलन साधने का प्रयास है, वहीं विरोधियों के लिए यह सपा के PDA फॉर्मूले की ईमानदारी पर सवाल उठाने का एक बड़ा मुद्दा बन गया है।
समाजवादी पार्टी का पीडीए और बहुजन विरोधी मानसिकता : अक्सर यह बात सामने आती है कि समाजवादी पार्टी अपने विधायकों और
और बहुजन समाज के प्रतिभाशाली जनप्रतिनिधियों का उतना ध्यान नहीं रखती जितनाहोना चाहिए
5mBy appointing Pandey as LoP, Akhilesh has BJP in a bind
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समाजवादी पार्टी का पीडीए और बहुजन विरोधी मानसिकता :
(ताकि सनद रहे!)
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श्री अखिलेश यादव जी!
मान्यवर !
आपके इस बयान पर नीचे जाकर मैंने टिप्पणियों को देखा, उन टिप्पणियों को देखने के बाद ऐसा लगा जैसे आज भी आपका पीडीए केवल नारा है !
यह बात सही है कि वर्तमान समय में पिछड़े वर्ग के लोगों से ही केंद्र की सत्ता व राज्य की सत्ता उन लोगों के हाथ में है जो अकेले पिछड़े वर्ग का नहीं दलित और तमाम उन लोगों का जिन लोगों का भला संविधान से संभव है उनको अंधभक्त बनाकर मनुस्मृति की व्यवस्था से धीरे-धीरे समृद्ध करते जा रहे हैं।
उन्हीं के लोग ना तो केंद्र में और नहीं प्रदेश में और न हीं देश के और किसी हिस्से में "यादव" नेतृत्व के साथ खड़े होते दिखाई देना तो दूर इन्हें अछूत बनाने पर लगे हुए हैं ! यहां तक की कई बार वर्तमान सत्ता की अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक मानसिकता की सोच से जाति,धर्म और संप्रदाय को जिस भेदभाव से देश में आम आदमी की मानसिक सोच बदलने में जितना बड़ा षड्यंत्र कर चुके हैं और निरंतर कर रहे हैं ?
उससे भी आगे जाकर एक जाति विशेष के खिलाफ हर तरह के षडयंत्र कर रहे हैं ; जिसमें बहुजन समाज के अनेक लोगों को मैं जानता हूं जो मानसिक रूप से उनकी इसी विचारधारा के पोषक हैं।
जिस गौरवशाली "यादव समाज" के योगदान को आज बहुजन समाज भूल गया है उस समाज के जिस विघटनकारी रूप का नजारा बिहार में देखने को मिला है, कमोबेस वही काम उत्तर प्रदेश में भी किया जा रहा है। इसका मुकाबला करने में जो सबसे बड़ा नुकसान सामने आ रहा है वह "अदृश्य" है।
यह "अदृश्य" क्या है यही सबसे बड़ा सवाल इस समय का है।
जिसमें प्रमुख रूप से बहुजन बुद्धिजीवियों; नेताओं; व्यापारियों; लालची और स्वार्थी लोगों का बहुत बड़ा समूह जो दिखाई दे रहा है ? जिसे भौकाल बनाकर अंधविश्वास-पाखंड में अखंड गहराई तक डूबा हुआ है! वही "अदृश्य" समूह सबसे बड़ा नुकसान करने वाला समाज है।
यह समाज सांस्कृतिक रूप से गुलाम हो चुका है इसकी गुलामी के पीछे जितनी बड़ी साजिश है उस साजिश को समाप्त करने के लिए समाज में ना तो पेरियार हैं, ज्योतिबा फूले हैं, ललई सिंह यादव हैं, रामस्वरूप वर्मा है, राम सेवक यादव हैं और न ही कथित रूप से दलित आंदोलन के जनक बाबा साहब अंबेडकर के विचारों के समग्र रूप से मानने वाले अंबेडकरवादी ही नजर आ रहे हैं।
ऐसे समाज से लड़ने के लिए "पीडीए" का नारा कितना कारगर होगा !
मनुवादी सोच के समाजवादी मूलत: इस लड़ाई को लड़ने में उसके साथ ज्यादा है जिससे पीडीए सत्ता लेना चाहता है।
यह केवल मेरी चिंता नहीं है बल्कि उन सभी लोगों की चिंता है जो आपके हितैषी हैं पर स्वार्थी और चाटुकार नहीं !
जिस आंदोलन की जरूरत है उस आंदोलन के वैचारिक लोगों को वैचारिक रूप से अवाम को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल नहीं लगाने की जरूरत है।
यह कैसे होगा चिंता इसी बात की है।
-डॉ लाल रत्नाकर
(पिछड़े वर्ग के लिए आपकी चिंता जायज है जो भाजपा के क्रियाकलाप को आप समाज के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं वह वह समझ नहीं सकता न ही समझता और ना ही समझना चाहता है)


