कौन कहता है कि ईश्वर को मत मानिए।
मगर इस बात का ध्यान रखिए की किसी की धार्मिक आस्था और विचारधारा को पार्टी नियंत्रित नहीं करती बल्कि
"पार्टियों को संविधान की व्यवस्था पर गौर करना चाहिए और उसी तरह से राजनीतिक प्रतिबद्धता तय करनी चाहिए" यथा :
अनुच्छेद 25 में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।
अनुच्छेद 25(1) का मूल पाठ:
“लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए,
*सभी व्यक्ति अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने के समान हकदार होंगे**।”
यानी संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि **सभी व्यक्ति समान रूप से** धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने के हकदार हैं।
अतिरिक्त संबंधित प्रावधान:
- **अनुच्छेद 15** राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
- **प्रस्तावना (Preamble)** — भारत को “Secular” (धर्मनिरपेक्ष) गणराज्य घोषित किया गया है (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया)।
- **अनुच्छेद 14, 16, 26, 27 और 28** — ये भी सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार और राज्य की तटस्थता सुनिश्चित करते हैं।
*संक्षेप में**: सभी धर्मों को बराबर की मान्यता और समान धार्मिक स्वतंत्रता का सबसे सीधा उल्लेख **अनुच्छेद 25** में है।
(ग्रोक से साभार)
माननीय शिवपाल जी और श्री राम गोपाल जी माननीय नेता जी के बनाए हुए राजनीतिक है ! (राजनीतिज्ञ नहीं) क्या है इनका अपना अलग से कोई राजनीतिक विचार है या बिल्कुल "वैचारिक अस्तित्व ही नहीं है"।
मुझे याद आता है नेताजी के समय में जब बीजेपी धर्म की राजनीति कर रही थी तो नेताजी ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि मैं अयोध्या का मंदिर सोने का बनवा दूं तभी यह मुझे धार्मिक नहीं मानेंगे क्योंकि इन्होंने धर्म का बहाना लेकर समाजवादी राजनीति के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं जो भविष्य में देश को बर्बाद कर देगा।
आज जो कुछ हो रहा है यह नेता जी को पता था जिसे बहुत कम लोग ऐसे हैं जो नेता जी के इस विचार को जानते या समझते होंगे लेकिन यह बात तो स्पष्ट तौर पर सभी लोगों को पता है कि भाजपा के लोग नेताजी को मुल्ला मुलायम सिंह कहते रहे हैं। जीतनी बदनामी हो सकत ी है किये क्योंकि उनको पता था यह आदमी जमीन से जुड़ा है इसकी बात आम आदमी तक पहुंचती है यह वास्तव में धरती पुत्र है।
माननीय नेताजी इसीलिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे कि वह धर्मनिरपेक्षता के मानने वाले और संविधान को सर्वोपर रखते हुए राजनीति करने वाले लोगों में अग्रणी थे । उन्होंने कभी भी धर्म की राजनीति से समझौता नहीं किया और हमेशा सभी धर्म के साथ समान रूप से खड़े रहे धर्मनिरपेक्षता का सदा उन्होंने पालन किया, उनके लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, पारसी, बौद्ध और जैन मतावलंबी सब बराबर थे, किसी को भी कभी भी धार्मिक रूप से अलग करके नहीं देखते थे।
यह होता है समाजवाद ।
माननीय शिवपाल जी आपकी विचारधारा में ब्राह्मणों को संतुष्ट करने की बू आती है जो किसी भी समाजवादी के लिए उचित नहीं होती ? जबकि जिस व्यक्ति को आप अपने साक्षात्कार में सवाल खड़ा कर रहे हैं वह व्यक्ति आपकी पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विशेष करके बहुजन विचारधारा के लोगों में मान्यता प्रदान करने में अहम रोल का निर्वहन किया है और निरंतर कर रहे हैं।
आपके शुभचिंतकों से और उन तमाम लोगों के माध्यम से मेरा आग्रह है कि इस तरह की बयानबाजी और बातचीत की से बचें जो भी पत्रकार आपसे सवाल कर रहे हैं वह आपके विनाश की बात कर रहे हैं ऐसे सवालों को टाल देने में क्या ही नुकसान है।
मान्यवर।
आप पार्टी के प्रति कितने निष्ठावान हैं यह बात तो इतिहास में दर्ज हो गई है लेकिन प्रोफेसर रामगोपाल को जिस तरह की बात कहनी चाहिए उस पर गौर करना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति इस तरह की बात बोलता है ? वह किसी से डरता नहीं. सत्य के साथ खड़ा होता है और संविधान के पक्ष में संवाद करता है ।
क्या राजकुमार भाटी जी ने जो कुछ किया है उसमें कहीं भी समाजवाद और संविधान की अवमानना या किसी धरम को किसी भी तरह का खतरा नजर आता है, नहीं ऐसा नहीं है। यह बात समय से समझी नहीं गई तो उसका बहुत बड़ा नुक्सान होगा जिसके परिणाम की भरपाई करना किसी के भी बस का नहीं है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी अच्छे इंसान हैं बाहर पढ़े लिखे हैं उनकी अपनी कुछ मजबूरियां हो सकती हैं ? लेकिन वह अच्छी तरह से समझते हैं कि जब तक बहुजन समाज को जागरूक नहीं किया जाएगा तब तक देश की राजनीति में जनसमर्थन प्राप्त करना संभव नहीं होगा ? यह तभी संभव है जब श्री राज कुमार भाटी जी जैसे पार्टी प्रवक्ता होंगे जो पाखंडियों के अन्धविश्वास और ठगी को चमत्कारिक रूप से उन्हें समझाते हैं और आदमी बनने की हिदायत भी देते हैं।
"इसलिए परिवारजनों से निवेदन है कि पार्टी को समाजवादी रहने दें, संवैधानिक और लोकतांत्रिक रहने दें और किसी खास मकसद से अपनी पहचान को किसी पर थ़ोपने का षड्यंत्र न करें। यदि संभव हो तो नेता जी के विचारों को भी समझने की कोशिस करें। पार्टी और नेता जी ने उन्हें क्या नहीं दिया और श्री अखिलेश जी ने कौन काम कर दिया है पुरे कुनबे को लेकर चल रहे हैं और समाज इसे देख भी रहा है आप के लिए पुरे समाज को कुर्बान कर दिए मगर आपकी औलादों की अनदेखी नहीं की है अतः आप लोग उनके हितैषियों की ऐसी की तैसी न करें ?
अगर इस पर गहराई से शोध किया जाए तो यह बात प्रकाश में आएगी की जो लोग इस तरह की हिदायत और राय दे रहे हैं उन्हें कहीं से संदेश आ गया होगा कि आप ऐसे प्रवक्ता को अपनी पार्टी से बाहर करिए ? जिससे उनके षड्यंत्र तंत्र आराम से जनता तक जाते रहे और जनता का ब्रेनवाश कर मानसिक संतुलन खराब किया जाता रहे और वह अपने अधिकारों को भूलकर पाखंड, अंधविश्वास और चमत्कार के चक्कर में पड़कर ऐसे संविधान विरोधी, बहुजन विरोधी, मनुवादी लोगों का समर्थन करता रहे जो हजारों साल से समाज को विभाजित करके अपना प्रभुत्व जमाऐ हुए हैं।
यह बात राष्ट्रीय अध्यक्ष जी भलीभांति जानते हैं समाजवादी पार्टी को उस दलदल से निकालने में राजकुमार भाटी जी का बहुत बड़ा योगदान है इस बात को राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को आगे भी ध्यान में रखना चाहिए और अपने परिवारजनों को जो मिला है उसी में खुश रहने की सलाह देना चाहिए।
काफी लोग टिप्पणियां कर रहे हैं उनको भी पढ़ना चाहिए -
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"राजकुमार भाटी ने 22 प्रतिज्ञा पढ़ कर क्या सच में अपराध किया?
समाजवादी पार्टी समाजवादी विचारधारा की धर्मनिरपेक्षता को ईमानदारी से पालन करने वाली पार्टी है। पिछले 10 सालों में तेजी से अम्बेडकरवाद को ईमानदारी से आत्मसात करती आगे बढ़ रही है। फ़िलहाल लाल और नीले रंग में बिल्कुल भेद ख़त्म मानती नज़र आती है।जिसका नतीजा 2024 में शानदार मिला।
लोग आरोप लगा रहे हैं कि हिंदू वोट राजकुमार भाटी के बयान से नाराज हो जायेगा।राजकुमार भाटी ने हिंदू देवताओं का अपमान किया है। जितनी जल्दी हो सके पार्टी को एक्शन लेना चाहिये,राजकुमार भाटी के अपराध की सज़ा आनन फ़ानन में मुक़र्रर की जाये।
पर ज़रा ठहरिये, क्या राजकुमार भाटी कुछ ग़लत कर भी रहे थे? भाटी जी तो एक सामाजिक कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर उपस्थित थे।कार्यक्रम बौद्ध धम्म के अनुयायियों का था।जो 22 प्रतिज्ञाएं पढ़ी गई वो भी बाबा साहब भीम राव आंबेडकर जी ने स्वयं ली थी।
ऐसे में राजकुमार भाटी के ख़िलाफ़ जी जान लगा रहे क्या बौद्ध धम्म के ख़िलाफ़ हैं? या बाबा साहब का विरोध कर रहे हैं? अगर कोई कार्यवायी होती है तो क्या बौद्ध धम्म के अनुयायियों का अपमान नहीं होगा? क्या अंबेडकरवादी नाराज नहीं हो जायेंगे। जय भीम के नारे के साथ भीम को भी ईमानदारी से स्वीकार करना होगा ना। या नहीं?
अगर धर्म रक्षा का झंडा इतना ही बुलंद करना है तो क्यों नहीं बाबा साहब के ही ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू कर देते ये भावना आहत गैंग वाले? और तो और जितने कट्टर हिंदू हिंदू हैं वो भाजपा को छोड़ कहीं नहीं जाने वाले।और जो समझदार शिक्षित जागरूक हिंदू हैं वो किसी भी झाँसे में नहीं आने वाले।
राजकुमार भाटी का ये व्यवहार बेहद ही निजी विषय है राजनैतिक नहीं।ऐसे में राजकुमार भाटी कहीं से भी दोषी नहीं हैं। हाँ संघियों के गले की हड्डी ज़रूर हैं।"
(विनीत कुमार की पोस्ट से यह अंश साभार।)
"भारत विभिन्न धर्मो का देश है |राजनीतिक पार्टी में किसी भी मत, विचार, विचारधारा के व्यक्ति का रहना उसका अपना अधिकार है| बाबा साहब डॉo अंबेडकर के द्वारा ली गई 22 प्रतिज्ञाओं को राजकुमार भाटी जी ने दोहराने का काम किया| उन्होंने स्वयं यह संकल्प लिया कि मैं ऐसा नहीं मानूंगा ऐसा नहीं करूंगा इसमें दूसरे की भावनाएं आहत होने का कोई सवाल ही नहीं है| भारत के पाखंडी, अल्पजन उन्हें तरह-तरह की गालियां दे रहे हैं| भारत की 90% आबादी देख रही है | समाजवादी पार्टी अगर उनके खिलाफ कोई एक्शन लेती है| तो यह अपमान बुद्ध, अशोक, फुले ,शाहू ,आंबेडकर की विचारधारा के समस्त लोगों का होगा??? फेसबुक से जुड़े सभी भद्रजनों को मैं आमंत्रित करता हूं इस विषय पर अपनी भी राय साझा करें!"
(भन्ते सुमित रतन की पोस्ट साभार।)
पिछड़ी जातियों की राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी इसके प्रथम पंक्ति के नेता हैं. बौद्धिक स्तर पर देखा जाए तो अपनी जनता से भी ज्यादा पिछड़े हुए. कारण है कि उनमें से अधिकांश को राजनीति विरासत में मिली है. उनकी पहली पीढ़ी को मंडल-समर्थक आंदोलन में भागीदारी का अवसर मिला था. इस कारण उनमें थोड़ी वर्गीय चेतना थी, किंतु उनके उत्तराधिकरियों ने इसे केवल जाति की राजनीति पर लाकर खड़ा कर दिया है.
हकीकत कुछ भी हो, उत्तर प्रदेश की सत्ता से अखिलेश को बाहर करने के लिए भाजपा ने उनपर यादववादी राजनीति करने का आरोप लगाया था. अखिलेश यादव या उनके परिजनों ने स्वयं इसके विरोध में कुछ नहीं कहा, लेकिन समाजवादी पार्टी के दूसरे बड़े नेता उसका स्पष्टीकरण देते आए हैं. लोग कदाचित भूलने भी लगे हैं. लेकिन हाल में राजकुमार भाटी प्रकरण पर पार्टी की ओर से आ रही प्रतिक्रियाएं फिर एहसास दिलाने लगी हैं कि समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह एंड ब्रदर्स की जेबी पार्टी थी. कम से कम उनके उत्तराधिकारी तो ऐसा ही समझते हैं. हो सकता है ऐसा न हो, लेकिन रामकुमार भाटी प्रकरण पर जिस तरह यादव-द्वय, रामगोपाल यादव तथा शिवपाल सिंह यादव के बयान चर्चा में हैं, इससे संदेश तो यही जाता है. इनमें प्रोफेसर रामगोपाल यादव तो पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता हैं, इसलिए उन्हें बयान देने का अधिकार है, लेकिन महज विधायक होने के नाते शिवपाल सिंह यादव ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह न केवल अनावश्यक है, बल्कि अनुशासनहीनता और मर्यादा का लंघन है.
फिर रामकुमार भाटी ने जो कहा, वह इन दिनों पढ़े-लिखे बहुजन युवाओं में बढ़ती वर्गीय चेतना का सुफल है, जो राजनीति में सहभागिता के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक स्वाधीनता को भी उतना ही महत्त्व देती है. यादव-युवाओं का पढ़ा-लिखा वर्ग भी ऐसा ही सोचता है. इसे देखते हुए यादव-द्वय चाहते तो राजकुमार भाटी द्वारा ली गई बाइस प्रतिज्ञाओं को उनका व्यक्तिगत निर्णय बताकर टाल भी सकते थे. अथवा राजकुमार भाटी के (गैरजरूरी) स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए, मामले को ठंडा कर सकते थे.
राजनीतिक विवेक से रहित यादव-द्वय की प्रतिक्रिया बहुजन युवाओं की उस पढ़ी-लिखी पीढ़ी को, जो जातीय चेतना से वर्गीय चेतना को ज्यादा महत्त्व देती है, निराश कर पार्टी से दूर ले जा सकती है. यह तीन प्रतिशत मतों के लालच में चालीस प्रतिशत मतदाता वर्ग को दाव पर लगाने जैसा है. समाजवादी पार्टी के लिए यह नया भी नहीं है. इससे पहले लोटनराम निषाद जो बहुजन समाज की सांस्कृतिक दासता के विरोध में मुखर रहते थे, को भी वह चुप करा चुकी है.
साभार: डॉ ओमप्रकाश कश्यप जी की पोस्ट।
यथा : अगर कश्यप जी बातों पर गौर किया जाय तो "फिर राज कुमार भाटी ने जो कहा, वह इन दिनों पढ़े-लिखे बहुजन युवाओं में बढ़ती वर्गीय चेतना का सुफल है, जो राजनीति में सहभागिता के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक स्वाधीनता को भी उतना ही महत्त्व देती है. यादव-युवाओं का पढ़ा-लिखा वर्ग भी ऐसा ही सोचता है.
इसे देखते हुए यादव-द्वय चाहते तो राजकुमार भाटी द्वारा ली गई बाइस प्रतिज्ञाओं को उनका व्यक्तिगत निर्णय बताकर टाल भी सकते थे. अथवा राजकुमार भाटी के (गैरजरूरी) स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए, मामले को ठंडा कर सकते थे. "
काश यह बात उनको समझ में आती तो बात ही क्या थी पहले श्री लौटन राम जैसे व्यक्ति के साथ यही किया गया अब भाटी जी के खिलाफ पाखंडियों का हमला है जिसे श्री अखिलेश जी के परिवारजनों की तरफ से शुरू कराया गया है ? क्या किसी के पास कोई उदाहरण है जिसमे यादव-द्वय पार्टी की नीतियों के प्रति कभी मुहँ खोले हों या किसी बहुजन और अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचाचार पर सड़क पर आये हों मैंने तो नहीं देखा सूना है ?
श्री राम गोपाल जी और श्री शिवपाल सिंह जी को यह ज़रूर पढ़ना चाहिये ।
श्री अखिलेश जी वक्त की नब्ज़ को समझते हैं। इसलिए उन्होंने भाटी जी को जो सम्मान दिया है वही असली नेतृत्व का गुण है.
अंत भला तो सब चंगा !







