बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

इस बात का ध्यान रखिए की किसी की धार्मिक आस्था और विचारधारा को पार्टी नियंत्रित नहीं करती !



कौन कहता है कि ईश्वर को मत मानिए।
 
-डॉ.लाल रत्नाकर 


मगर इस बात का ध्यान रखिए की किसी की धार्मिक आस्था और विचारधारा को पार्टी नियंत्रित नहीं करती बल्कि 

"पार्टियों को संविधान की व्यवस्था पर गौर करना चाहिए और उसी तरह से राजनीतिक प्रतिबद्धता तय करनी चाहिए" यथा :

अनुच्छेद 25 में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।

अनुच्छेद 25(1) का मूल पाठ:

“लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, 

*सभी व्यक्ति अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने के समान हकदार होंगे**।”

यानी संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि **सभी व्यक्ति समान रूप से** धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने के हकदार हैं।

अतिरिक्त संबंधित प्रावधान:

- **अनुच्छेद 15** राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

- **प्रस्तावना (Preamble)** — भारत को “Secular” (धर्मनिरपेक्ष) गणराज्य घोषित किया गया है (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया)।

- **अनुच्छेद 14, 16, 26, 27 और 28** — ये भी सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार और राज्य की तटस्थता सुनिश्चित करते हैं।

*संक्षेप में**: सभी धर्मों को बराबर की मान्यता और समान धार्मिक स्वतंत्रता का सबसे सीधा उल्लेख **अनुच्छेद 25** में है।

(ग्रोक से साभार)

माननीय शिवपाल जी और श्री राम गोपाल जी माननीय नेता जी के बनाए हुए राजनीतिक है ! (राजनीतिज्ञ नहीं) क्या है इनका अपना अलग से कोई राजनीतिक विचार है या बिल्कुल "वैचारिक अस्तित्व ही नहीं है"। 

मुझे याद आता है नेताजी के समय में जब बीजेपी धर्म की राजनीति कर रही थी तो नेताजी ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि मैं अयोध्या का मंदिर सोने का बनवा दूं तभी यह मुझे धार्मिक नहीं मानेंगे क्योंकि इन्होंने धर्म का बहाना लेकर समाजवादी राजनीति के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं जो भविष्य में देश को बर्बाद कर देगा। 

आज जो कुछ हो रहा है यह नेता जी को पता था जिसे बहुत कम लोग ऐसे हैं जो नेता जी के इस विचार को जानते या समझते होंगे लेकिन यह बात तो स्पष्ट तौर पर सभी लोगों को पता है कि भाजपा के लोग नेताजी को मुल्ला मुलायम सिंह कहते रहे हैं। जीतनी बदनामी हो सकत ी है किये क्योंकि उनको पता था यह आदमी जमीन से जुड़ा है इसकी बात आम आदमी तक पहुंचती है यह वास्तव में धरती पुत्र है। 

माननीय नेताजी इसीलिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे कि वह धर्मनिरपेक्षता के मानने वाले और संविधान को सर्वोपर रखते हुए राजनीति करने वाले लोगों में अग्रणी थे । उन्होंने कभी भी धर्म की राजनीति से समझौता नहीं किया और हमेशा सभी धर्म के साथ समान रूप से खड़े रहे धर्मनिरपेक्षता का सदा उन्होंने पालन किया, उनके लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, पारसी,  बौद्ध और जैन मतावलंबी सब बराबर थे, किसी को भी कभी भी धार्मिक रूप से अलग करके नहीं देखते थे।

यह होता है समाजवाद ।

माननीय शिवपाल जी आपकी विचारधारा में ब्राह्मणों को संतुष्ट करने की बू आती है जो किसी भी समाजवादी के लिए उचित नहीं होती ? जबकि जिस व्यक्ति को आप अपने साक्षात्कार में सवाल खड़ा कर रहे हैं वह व्यक्ति आपकी पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विशेष करके बहुजन विचारधारा के लोगों में मान्यता प्रदान करने में अहम रोल का निर्वहन किया है और निरंतर कर रहे हैं। 

आपके शुभचिंतकों से और उन तमाम लोगों के माध्यम से मेरा आग्रह है कि इस तरह की बयानबाजी और बातचीत की से बचें जो भी पत्रकार आपसे सवाल कर रहे हैं वह आपके विनाश की बात कर रहे हैं ऐसे सवालों को टाल देने में क्या ही नुकसान है। 

मान्यवर। 

आप पार्टी के प्रति कितने निष्ठावान हैं यह बात तो इतिहास में दर्ज हो गई है लेकिन प्रोफेसर रामगोपाल को जिस तरह की बात कहनी चाहिए उस पर गौर करना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति इस तरह की बात बोलता है ? वह किसी से डरता नहीं. सत्य के साथ खड़ा होता है और संविधान के पक्ष में संवाद करता है ।

क्या राजकुमार भाटी जी ने जो कुछ किया है उसमें कहीं भी समाजवाद और संविधान की अवमानना या किसी धरम को किसी भी तरह का खतरा नजर आता है, नहीं ऐसा नहीं है। यह बात समय से समझी नहीं गई तो उसका बहुत बड़ा नुक्सान होगा जिसके परिणाम की भरपाई करना किसी के भी बस का नहीं है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी अच्छे इंसान हैं बाहर पढ़े लिखे हैं उनकी अपनी कुछ मजबूरियां हो सकती हैं ? लेकिन वह अच्छी तरह से समझते हैं कि जब तक बहुजन समाज को जागरूक नहीं किया जाएगा तब तक देश की राजनीति में जनसमर्थन प्राप्त करना संभव नहीं होगा ? यह तभी संभव है जब श्री राज कुमार भाटी जी जैसे पार्टी प्रवक्ता होंगे जो पाखंडियों के अन्धविश्वास और ठगी को चमत्कारिक रूप से उन्हें समझाते हैं और आदमी बनने की हिदायत भी देते हैं। 

"इसलिए परिवारजनों से निवेदन है कि पार्टी को समाजवादी रहने दें, संवैधानिक और लोकतांत्रिक रहने दें और किसी खास मकसद से अपनी पहचान को किसी पर थ़ोपने का षड्यंत्र न करें। यदि संभव हो तो नेता जी के विचारों को भी समझने की कोशिस करें। पार्टी और नेता जी ने उन्हें क्या नहीं दिया और श्री अखिलेश जी ने कौन काम कर दिया है पुरे कुनबे को लेकर चल रहे हैं और समाज इसे देख भी रहा है आप के लिए पुरे समाज को कुर्बान कर दिए मगर आपकी औलादों की अनदेखी नहीं की है अतः आप लोग उनके हितैषियों की ऐसी की तैसी न करें ?

अगर इस पर गहराई से शोध किया जाए तो यह बात प्रकाश में आएगी की जो लोग इस तरह की हिदायत और राय दे रहे हैं उन्हें कहीं से संदेश आ गया होगा कि आप ऐसे प्रवक्ता को अपनी पार्टी से बाहर करिए ? जिससे उनके षड्यंत्र तंत्र आराम से जनता तक जाते रहे और जनता का ब्रेनवाश कर मानसिक संतुलन खराब किया जाता रहे और वह अपने अधिकारों को भूलकर पाखंड, अंधविश्वास और चमत्कार के चक्कर में पड़कर ऐसे संविधान विरोधी, बहुजन विरोधी, मनुवादी लोगों का समर्थन करता रहे जो हजारों साल से समाज को विभाजित करके अपना प्रभुत्व जमाऐ हुए हैं।

यह बात राष्ट्रीय अध्यक्ष जी भलीभांति जानते हैं समाजवादी पार्टी को उस दलदल से निकालने में राजकुमार भाटी जी का बहुत बड़ा योगदान है इस बात को राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को आगे भी ध्यान में रखना चाहिए और अपने परिवारजनों को जो मिला है उसी में खुश रहने की सलाह देना चाहिए।

काफी लोग टिप्पणियां कर रहे हैं उनको भी पढ़ना चाहिए -

https://www.facebook.com/share/r/1UEKLHpRzi/

"राजकुमार भाटी ने 22 प्रतिज्ञा पढ़ कर क्या सच में अपराध किया? 

समाजवादी पार्टी समाजवादी विचारधारा की धर्मनिरपेक्षता को ईमानदारी से पालन करने वाली पार्टी है। पिछले 10 सालों में तेजी से अम्बेडकरवाद को ईमानदारी से आत्मसात करती आगे बढ़ रही है। फ़िलहाल लाल और नीले रंग में बिल्कुल भेद ख़त्म मानती नज़र आती है।जिसका नतीजा 2024 में शानदार मिला। 

लोग आरोप लगा रहे हैं कि हिंदू वोट राजकुमार भाटी के बयान से नाराज हो जायेगा।राजकुमार भाटी ने हिंदू देवताओं का अपमान किया है। जितनी जल्दी हो सके पार्टी को एक्शन लेना चाहिये,राजकुमार भाटी के अपराध की सज़ा आनन फ़ानन में मुक़र्रर की जाये। 

पर ज़रा ठहरिये, क्या राजकुमार भाटी कुछ ग़लत कर भी रहे थे? भाटी जी तो एक सामाजिक कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर उपस्थित थे।कार्यक्रम बौद्ध धम्म के अनुयायियों का था।जो 22 प्रतिज्ञाएं पढ़ी गई वो भी बाबा साहब भीम राव आंबेडकर जी ने स्वयं ली थी।

ऐसे में राजकुमार भाटी के ख़िलाफ़ जी जान लगा रहे क्या बौद्ध धम्म के ख़िलाफ़ हैं? या बाबा साहब का विरोध कर रहे हैं? अगर कोई कार्यवायी होती है तो क्या बौद्ध धम्म के अनुयायियों का अपमान नहीं होगा? क्या अंबेडकरवादी नाराज नहीं हो जायेंगे। जय भीम के नारे के साथ भीम को भी ईमानदारी से स्वीकार करना होगा ना। या नहीं? 

अगर धर्म रक्षा का झंडा इतना ही बुलंद करना है तो क्यों नहीं बाबा साहब के ही ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू कर देते ये भावना आहत गैंग वाले? और तो और जितने कट्टर हिंदू हिंदू हैं वो भाजपा को छोड़ कहीं नहीं जाने वाले।और जो समझदार शिक्षित जागरूक हिंदू हैं वो किसी भी झाँसे में नहीं आने वाले।

राजकुमार भाटी का ये व्यवहार बेहद ही निजी विषय है राजनैतिक नहीं।ऐसे में राजकुमार भाटी कहीं से भी दोषी नहीं हैं। हाँ संघियों के गले की हड्डी ज़रूर हैं।"

(विनीत कुमार की पोस्ट से यह अंश साभार।)

"भारत विभिन्न धर्मो का देश है |राजनीतिक पार्टी में किसी भी मत, विचार, विचारधारा के व्यक्ति का रहना उसका अपना अधिकार है| बाबा साहब डॉo अंबेडकर के द्वारा ली गई 22 प्रतिज्ञाओं को राजकुमार भाटी जी ने दोहराने का काम किया| उन्होंने स्वयं यह संकल्प लिया कि मैं ऐसा नहीं मानूंगा ऐसा नहीं करूंगा इसमें दूसरे की भावनाएं आहत होने का कोई सवाल ही नहीं है| भारत के पाखंडी, अल्पजन उन्हें तरह-तरह की गालियां दे रहे हैं| भारत की 90% आबादी देख रही है | समाजवादी पार्टी अगर उनके खिलाफ कोई एक्शन लेती है| तो यह अपमान बुद्ध, अशोक, फुले ,शाहू ,आंबेडकर की विचारधारा के समस्त लोगों का होगा??? फेसबुक से जुड़े सभी भद्रजनों को मैं आमंत्रित करता हूं इस विषय पर अपनी भी राय साझा करें!"

(भन्ते सुमित रतन की पोस्ट साभार।)

पिछड़ी जातियों की राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी इसके प्रथम पंक्ति के नेता हैं. बौद्धिक स्तर पर देखा जाए तो अपनी जनता से भी ज्यादा पिछड़े हुए. कारण है कि उनमें से अधिकांश को राजनीति विरासत में मिली है. उनकी पहली पीढ़ी को मंडल-समर्थक आंदोलन में भागीदारी का अवसर मिला था. इस कारण उनमें थोड़ी वर्गीय चेतना थी, किंतु उनके उत्तराधिकरियों ने इसे केवल जाति की राजनीति पर लाकर खड़ा कर दिया है. 

हकीकत कुछ भी हो, उत्तर प्रदेश की सत्ता से अखिलेश को बाहर करने के लिए भाजपा ने उनपर यादववादी राजनीति करने का आरोप लगाया था. अखिलेश यादव या उनके परिजनों ने स्वयं इसके विरोध में कुछ नहीं कहा, लेकिन समाजवादी पार्टी के दूसरे बड़े नेता उसका स्पष्टीकरण देते आए हैं. लोग कदाचित भूलने भी लगे हैं. लेकिन हाल में राजकुमार भाटी प्रकरण पर पार्टी की ओर से आ रही प्रतिक्रियाएं फिर एहसास दिलाने लगी हैं कि समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह एंड ब्रदर्स की जेबी पार्टी थी. कम से कम उनके उत्तराधिकारी तो ऐसा ही समझते हैं. हो सकता है ऐसा न हो, लेकिन रामकुमार भाटी प्रकरण पर जिस तरह यादव-द्वय, रामगोपाल यादव तथा शिवपाल सिंह यादव के बयान चर्चा में हैं, इससे संदेश तो यही जाता है. इनमें प्रोफेसर रामगोपाल यादव तो पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता हैं, इसलिए उन्हें बयान देने का अधिकार है, लेकिन महज विधायक होने के नाते शिवपाल सिंह यादव ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह न केवल अनावश्यक है, बल्कि अनुशासनहीनता और मर्यादा का लंघन है. 

फिर रामकुमार भाटी ने जो कहा, वह इन दिनों पढ़े-लिखे बहुजन युवाओं में बढ़ती वर्गीय चेतना का सुफल है, जो राजनीति में सहभागिता के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक स्वाधीनता को भी उतना ही महत्त्व देती है. यादव-युवाओं का पढ़ा-लिखा वर्ग भी ऐसा ही सोचता है. इसे देखते हुए यादव-द्वय चाहते तो राजकुमार भाटी द्वारा ली गई बाइस प्रतिज्ञाओं को उनका व्यक्तिगत निर्णय बताकर टाल भी सकते थे. अथवा राजकुमार भाटी के (गैरजरूरी) स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए, मामले को ठंडा कर सकते थे. 

राजनीतिक विवेक से रहित यादव-द्वय की प्रतिक्रिया बहुजन युवाओं की उस पढ़ी-लिखी पीढ़ी को, जो जातीय चेतना से वर्गीय चेतना को ज्यादा महत्त्व देती है, निराश कर पार्टी से दूर ले जा सकती है. यह तीन प्रतिशत मतों के लालच में चालीस प्रतिशत मतदाता वर्ग को दाव पर लगाने जैसा है. समाजवादी पार्टी के लिए यह नया भी नहीं है. इससे पहले लोटनराम निषाद जो बहुजन समाज की सांस्कृतिक दासता के विरोध में मुखर रहते थे, को भी वह चुप करा चुकी है.

साभार: डॉ ओमप्रकाश कश्यप जी की पोस्ट। 

यथा : अगर कश्यप जी बातों पर गौर किया जाय तो "फिर राज कुमार भाटी ने जो कहा, वह इन दिनों पढ़े-लिखे बहुजन युवाओं में बढ़ती वर्गीय चेतना का सुफल है, जो राजनीति में सहभागिता के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक स्वाधीनता को भी उतना ही महत्त्व देती है. यादव-युवाओं का पढ़ा-लिखा वर्ग भी ऐसा ही सोचता है. 

इसे देखते हुए यादव-द्वय चाहते तो राजकुमार भाटी द्वारा ली गई बाइस प्रतिज्ञाओं को उनका व्यक्तिगत निर्णय बताकर टाल भी सकते थे. अथवा राजकुमार भाटी के (गैरजरूरी) स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए, मामले को ठंडा कर सकते थे. "

काश यह बात उनको समझ में आती तो बात ही क्या थी पहले श्री लौटन राम जैसे व्यक्ति के साथ यही किया गया अब भाटी जी के खिलाफ पाखंडियों का हमला है जिसे श्री अखिलेश जी के परिवारजनों की तरफ से शुरू कराया गया है ? क्या किसी के पास कोई उदाहरण है जिसमे यादव-द्वय पार्टी की नीतियों के प्रति कभी मुहँ खोले हों या किसी बहुजन और अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचाचार पर सड़क पर आये हों मैंने तो नहीं देखा सूना है ?

श्री राम गोपाल जी और श्री शिवपाल सिंह जी को यह ज़रूर पढ़ना चाहिये ।    

श्री अखिलेश जी वक्त की नब्ज़ को समझते हैं। इसलिए उन्होंने भाटी जी को जो सम्मान दिया है वही असली नेतृत्व का गुण है. 

अंत भला तो सब चंगा !

(साभार फेसबुक से।)


यह विवाद थामें तो बात आगे बढे क्योंकि धर्म की राजनीती में हथकंडे बहुत हैं जिनका मुकाबला करना सांस्कृतिक साम्राजयवाद के खिलाफ अभियान से ही संभव है। 
-डॉ. लाल रत्नाकर 



मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

समाजवादियों की राजनीती में पूंजीवाद की बू आने लगी है।

 कंपोजिशन करना अपने आप में विवेक और अनुभव पर आधारित होता है। अनुकरण और अनुभव में बहुत अंतर होता है इस अंतर को आमतौर पर छोटे बच्चे नजर अंदाज करते हैं। तभी आप पाते हैं कि उनके मन की परिकल्पना उनके चित्रों में विराजमान होती है उसे आप समझ पाएं या भले ना पाएं। कमोवेश राजनीती में भी यही होता है और समाजवादियों की राजनीती में पूंजीवाद की बू आने लगी है। 

यह कंपोजिशन उसी स्वभाव को दर्शाता है।



*****

मेरे अंदर का दर्द ?
कैसे मापोगे?
मेरे चेहरे से या किसी और से।
यह तो मैं भी नहीं जानता। 
अगला पल ?
कहां ले जायेगा ।
किसको पता है।
डॉ वैद्य हकीम कितने अच्छे हैं।
यह कैसे जानोगे।
मध्यकालीन स्वास्थ्य 
या आधुनिक आविष्कार ।
का इस्तेमाल करने का हक़ !
किसको किसको है ?
व्यापारी सरकार ।
सौदा कर रही है ?
समाजवादी पूंजीवाद से ।
उसको कैसे नापोगे।
सवाल जटिल है ?
उत्तर किससे मांगोगे ?
राजनीती नहीं घर और परिवार ?
यह कैसा है संवैधानिक अधिकार ?
देश का लोकतंत्र बचाने का। 

- डॉ लाल रत्नाकर 


शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

वर्ण व्यवस्था से पहले भारतीय समाज में जाती व्यवस्था थी क्या ?


वर्ण व्यवस्था से पहले भारतीय समाज में जाती व्यवस्था थी क्या ?

यह इतिहास और समाजशास्त्र का एक जटिल प्रश्न है, और इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि "जाति" से आपका क्या मतलब है।

संक्षेप में:

  • ऋग्वैदिक काल (लगभग 1500-1000 ईसा पूर्व) में समाज में पेशों और सामाजिक समूहों के भेद तो थे, लेकिन बाद के समय जैसी कठोर जाति व्यवस्था के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते।
  • वर्ण व्यवस्था का सबसे प्रसिद्ध उल्लेख ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में मिलता है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्णों का वर्णन है।
  • जातियाँ (जाती/जति), जैसा कि बाद में भारतीय समाज में हजारों स्थानीय, वंशानुगत और अंतर्विवाही समूहों के रूप में दिखाई देती हैं, इतिहासकारों के अनुसार लंबे समय में विकसित हुईं। वे केवल वर्ण व्यवस्था से नहीं, बल्कि पेशा, क्षेत्र, जनजातीय समुदायों के समावेशन, राजनीतिक सत्ता और सामाजिक रीति-रिवाजों के मिश्रण से बनीं।

कई इतिहासकारों का मत है कि:

  • पहले व्यापक वर्ण की अवधारणा थी।
  • बाद में विभिन्न स्थानीय समुदायों और पेशागत समूहों के आधार पर अनेक जातियाँ (जति) विकसित हुईं।
  • वास्तविक समाज में जातियाँ अक्सर वर्ण सिद्धांत से कहीं अधिक जटिल थीं।

हालाँकि, कुछ समाजशास्त्री और इतिहासकार यह भी तर्क देते हैं कि वर्ण और जाति का विकास समानांतर रूप से हुआ और इन्हें पूरी तरह अलग-अलग चरणों में बाँटना हमेशा संभव नहीं है।

इसलिए "वर्ण व्यवस्था से पहले जाति व्यवस्था थी" यह कहना अधिकांश मुख्यधारा ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार सही नहीं माना जाता। अधिक प्रचलित दृष्टिकोण यह है कि प्रारंभिक सामाजिक विभाजनों और वर्ण अवधारणा के बाद समय के साथ विस्तृत जाति व्यवस्था विकसित हुई।

इस विषय पर डॉ. भीमराव आंबेडकर, डी. डी. कोसांबी, रामशरण शर्मा और रोमिला थापर जैसे विद्वानों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। 

इन विद्वानों के दृष्टिकोण एक जैसे नहीं हैं, और यही बात इस विषय को रोचक बनाती है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर

अपनी पुस्तक Who Were the Shudras? और Annihilation of Caste में आंबेडकर ने तर्क दिया कि जाति व्यवस्था कोई प्राकृतिक या शाश्वत व्यवस्था नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक और धार्मिक नियंत्रण की प्रक्रिया से विकसित हुई। उनके अनुसार वर्ण और जाति एक ही चीज़ नहीं हैं। वर्ण सैद्धांतिक रूप से चार वर्गों की व्यवस्था थी, जबकि जाति हजारों बंद समूहों में विभाजित सामाजिक संरचना बन गई। आंबेडकर का प्रसिद्ध तर्क था कि जाति व्यवस्था का मूल आधार अंतर्विवाह (endogamy) है।

डी. डी. कोसांबी

कोसांबी ऐतिहासिक भौतिकवाद (Marxist approach) के दृष्टिकोण से समाज का अध्ययन करते थे। उनके अनुसार भारतीय समाज में विभिन्न जनजातियों, पेशागत समूहों और स्थानीय समुदायों के क्रमिक समावेशन से जातियाँ विकसित हुईं। वे मानते थे कि वास्तविक समाज की जातियाँ चार वर्णों के सिद्धांत से कहीं अधिक जटिल थीं और आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियों ने उनके निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई।

रामशरण शर्मा

रामशरण शर्मा ने प्राचीन भारत के सामाजिक और आर्थिक इतिहास का अध्ययन करते हुए बताया कि प्रारंभिक वैदिक समाज अपेक्षाकृत कम स्तरीकृत था। उनके अनुसार समय के साथ कृषि विस्तार, संपत्ति के संचय, राज्य निर्माण और श्रम विभाजन के कारण सामाजिक असमानताएँ बढ़ीं। वे मानते थे कि जाति व्यवस्था का क्रमिक विकास हुआ, न कि वह शुरू से ही अपने बाद के कठोर रूप में मौजूद थी।

रोमिला थापर

रोमिला थापर वर्ण और जाति में स्पष्ट अंतर करती हैं। उनके अनुसार प्राचीन ग्रंथों में वर्ण एक वैचारिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तविक समाज अनेक जातियों और स्थानीय समूहों से बना था। वे इस बात पर जोर देती हैं कि भारतीय समाज अलग-अलग क्षेत्रों और कालखंडों में अलग तरह से विकसित हुआ, इसलिए जाति की एक ही उत्पत्ति या एक ही रूप की बात करना कठिन है।

सारांश

इन चारों विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन एक बात पर काफी हद तक सहमति दिखाई देती है:

  • प्रारंभिक भारतीय समाज में सामाजिक भेद और समूह तो थे।
  • बाद की कठोर और बहुस्तरीय जाति व्यवस्था एक ऐतिहासिक प्रक्रिया में विकसित हुई।
  • वर्ण और जाति (जति) को एक ही चीज़ मानना इतिहास की दृष्टि से सही नहीं माना जाता।
  • वास्तविक समाज की हजारों जातियाँ चार वर्णों के सरल सिद्धांत से कहीं अधिक जटिल थीं।

दिलचस्प बात यह है कि आज की बहस अक्सर इस प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या वर्ण व्यवस्था ने जाति को जन्म दिया, या विभिन्न सामाजिक समूह पहले से मौजूद थे और बाद में उन्हें वर्ण ढाँचे में समझाया गया? अलग-अलग विद्वान इस प्रश्न का अलग उत्तर देते हैं।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

एक आकलन समय और समझ के साथ

एक आकलन समय और समझ के साथ 

- डॉ लाल रत्नाकर 

हम यह कैसे मान लें कि ईमानदारी और बेईमानी का शाब्दिक रद्दोबदल हो गया है कि जो बेईमान है वह ईमानदार है और ईमानदार बेईमान। इसके उदाहरण हमारी और आपकी जेहन में है लेकिन दोनों चाहते हैं की यथास्थिति बानी रहे और दूसरा सच कर दे या सच के लिए लडे । 


हरियाणा,मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र , बिहार और बंगाल में जो कुछ हुआ इसी दोहरी मानसिकता का परिणाम है जिनको लड़ना था उन्हें पता ही नहीं की किससे लड़ना है और कैसे लड़ना है ? कमोबेश यही हालात उत्तर प्रदेश के भी हैं , जबकि दिल्ली में यही लड़ाई चल रही है जिसे लड़ता हुआ कौन दिख रहा है उसे बताने की जरुरत नहीं है ? उत्तर प्रदेश का विपक्ष समाजवादी पार्टी है उसका कौन सा फ्रंट इस लड़ाई को देख रहा है ? अगर कोई देख रहा है तो दीखता क्यों नहीं है ? ममता की याद करके सिहरन पैदा होइ है वह तो बंगाल के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी कड़ी थीं, यहीं पर नेता जी की याद आती है उनके साथ या पास कम्युनिस्ट पार्टी के मज़बूत नेता साथ थे जो ईमानदार और सामजिक न्याय के प्रति सजग भी थे और उस समय आयोग और न्यायालयों में इतनी जड़ता भी नहीं थी जीतनी आज साफ़ साफ़ नज़र आ रही है। 

उतर प्रदेश की विपक्ष की पार्टी के पास दिल्ली स्थित कार्यालय है और काफी सांसद भी हैं, जिनको इस इस मुद्दे पर लड़ता हुआ कोई देख रहा है, कई तेज़ तर्रार महिला सांसद भी हैं उनकी क्या भूमिका है ? सैफई के बहुतेरे यादव सांसद भी हैं ! आमतौर पर बहस करते हुए यह सवाल खड़े होते हैं की उत्तर प्रदेश में सपा अगली सरकार बनाने जा रही है ? क्या यह सवाल सवाल आपके मन में भी आता है तो उत्तर कौन देगा पता नहीं ? पर जब सोसल मीडिआ की रिपोर्ट आती है तो ऐसा लगता है की उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी देश में लड़ती हुयी नज़र क्यों नहीं आ रही है। कोई चेहरा जो राष्ट्रीय अध्यक्ष से अलहदा हो दिखाई नहीं देता है ? मोहल्ले में तो अलग ही अवधारणा बनी हुयी है यादव, मुस्लिम, गुंडा, माफिआ और न जाने क्या क्या ? जबकि सपा प्रमुख इतने शालीन और सरल व्यक्ति हैं जिसका कोई जवाब नहीं पर शहरी और कथित सवर्ण सोच के बणिआ बामणों में उनकी छवि बदल क्यों नहीं रही है ?

आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के चुनाव होने हैं अभी से अफरा तफरी मची हुयी है इस अफरा तफरी में नियंत्रण की कमान किसके पास है क्या किसी को पता है यदि नहीं तो लड़ेंगे कैसे और किससे ?



श्री अखिलेश यादव जी पीडीए से कथित सवर्ण खुश नहीं हैं तो क्या करना चाहिए ?,,

सवर्णों की उम्मीद छोड़ देनी ही चाहिए क्योंकि उनकी पार्टी को वह पसंद नहीं करते ? 

यही कारण है कि बहुजन समाज की बहुत सारी जातियां सपा से ठीक से सट नहीं पा रही हैं ।

क्योंकि बहुजन जातियां जब यह देखती हैं कि सपा में अगडी जाति को बहुत तरजीह मिलती है जिसकी वह हकदार नहीं है।

देश में बहुसंख्य आवादी में मुसलमान है जिसे बीजेपी ने बायकॉट किया हुआ है वह जानती है की उनके वोट उसे नहीं मिलेंगे, देश में यादव की हालत वैसी ही गढ़ दी गयी है उससे निकलने की जरुरत है ? 

उससे कैसे निकला जाय चिंतन इस बात पर करने की जरुरत है पर इसपर कितना काम हो रहा है और कौन कर रहा है ?

हालांकि यह उनके लिए संभव ही नहीं है जो अंदर से डरे हुए हैं वह व्यापक बदलाव के पक्षधर नहीं हो सकते ?

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज से नेतृत्व के लिए जो उपयुक्त हो उसे क्यों नहीं तलाशा जा सकता ?

यह किसकी जिम्मेदारी है वर्तमान दौर में सोचना होगा गुजरे हुए जमाने से सीखना होगा उसके नफ़ा नुकसान का हिसाब लगाना होगा ? बहुजन समाज पार्टी का उदाहरण सामने है सवर्णो ने उसे निगल लिया। 

समाजवादी आंदोलन की धारा बदलनी चाहिए समाजवादी व्यक्तित्व को लाना होगा अन्यथा आंदोलन की राह आसान नहीं होगी क्योंकि जनता को एक साथ लाना है जिसे वह बहुत बेसब्री से देख रही है ?

अतः समाजवादी पार्टी इस पर कितना विचार करेगी यह अलग बात है पर यह सच्चाई है मुझे लगता है पहले संविधान विरोधी ताकतों को हटाना चाहिए जिसके लिए किसे क्या करना है यही तय करना होगा। 

आप देखिये की कहीं आप के आसपास संविधान विरोधी तो नहीं हैं ? 

राहुल जी भी यह बात अपने दल के लिए स्वीकार करते हैं जो स्वाभाविक भी है। 

किसी को तो फैसला लेना होगा सामजिक न्याय के लिए संविधान के प्रिएम्बल के लिए लड़ना होगा लागू करना होगा -

भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble)

"हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

कृपया इसको गंभीरता से लें लड़ाई आरपार की है समय नहीं है। 


शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

5 बड़ा या 7 ? विधायक बड़ा या सांसद ? राज्य बड़ा या केंद्र ?

 क्या कह रहे हैं अखिलेश यादव 
Akhilesh Yadav·
19h


·
5 बड़ा या 7 ?
विधायक बड़ा या सांसद ?
राज्य बड़ा या केंद्र ? 
राज्य सरकार का मंत्री बड़ा या केंद्र सरकार का? 
फिर सवाल ये है कि 5 बार के विधायक को भाजपाई राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाते हैं और 7 बार के सांसद को राज्य का अध्यक्ष। 
इसका तर्क क्या है… दरअसल इसका कोई तर्क भाजपा के पास नहीं है… इसका कारण सिर्फ़ ये है कि प्रभुत्ववादी भाजपाई ये संदेश देना चाहते हैं कि PDA समाज का व्यक्ति कितना भी क़ाबिल हो पर वो वर्चस्ववादियों के आगे एक सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता है। 
भाजपा ने पीडीए समाज को नीचा दिखाने को लिए ये नया तरीका अपनाया है। ये अपमान पीडीए समाज अब और नहीं सहेगा… अब अपनी पीडीए सरकार बनाएगा, पीडीए को मान दिलाएगा।

"पी डी ए " की विचारधारा और उत्तर प्रदेश की राजनीती : 
उत्तर प्रदेश विधानसभा में  को नेता प्रतिपक्ष (LoP) बनाए जाने का निर्णय समाजवादी पार्टी (सपा) के "PDA" (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद कदम रहा है।
इस नियुक्ति और इससे जुड़े मुख्य विवाद निम्नलिखित हैं:
1. नियुक्ति और रणनीति (PDA बनाम ब्राह्मण कार्ड)
  • अखिलेश यादव का दांव: लोकसभा चुनाव 2024 में PDA फॉर्मूले की सफलता के बाद, अखिलेश यादव ने एक ब्राह्मण चेहरे (माता प्रसाद पांडेय) को नेता प्रतिपक्ष चुनकर सबको चौंका दिया। इसे "P फॉर पंडित" रणनीति के रूप में देखा गया, जिसका उद्देश्य भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाना और यह संदेश देना था कि सपा सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है।
  • वरिष्ठता और अनुभव: 82 वर्षीय माता प्रसाद पांडेय सिद्धार्थनगर की इटवा सीट से सात बार के विधायक हैं और दो बार विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता और सदन के नियमों की गहरी समझ को भी इस चयन का मुख्य कारण बताया गया।
2. PDA के सवाल पर उठे प्रमुख विवाद
इस नियुक्ति के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने सपा के PDA के दावों पर सवाल उठाए:
  • मायावती (BSP) का हमला: बसपा प्रमुख  ने आरोप लगाया कि सपा ने लोकसभा चुनाव में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों का वोट तो लिया, लेकिन जब नेतृत्व देने की बारी आई, तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने इसे PDA समुदाय के साथ "धोखा" करार दिया।
  • भाजपा की प्रतिक्रिया: यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी इसे पिछड़ों और दलितों के साथ विश्वासघात बताया। भाजपा का तर्क था कि अखिलेश यादव केवल वोट के लिए PDA का नाम लेते हैं, लेकिन उच्च पदों पर अपनों या सवर्णों को ही प्राथमिकता देते हैं।
  • सपा का स्पष्टीकरण: अखिलेश यादव और माता प्रसाद पांडेय ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि 'A' (अल्पसंख्यक/अगुड़ा/आदिवासी) में सवर्ण और अन्य सभी शोषित वर्ग भी शामिल हैं। पांडेय ने स्वयं कहा कि वे लोहिया के समय से ही पिछड़ों और गरीबों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
  • ने पर भी बड़ा राजनीतिक बवाल हुआ था। सपा ने इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया था।
संक्षेप में, माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति सपा के लिए जहाँ एक तरफ जातीय संतुलन साधने का प्रयास है, वहीं विरोधियों के लिए यह सपा के PDA फॉर्मूले की ईमानदारी पर सवाल उठाने का एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

समाजवादी पार्टी का पीडीए और बहुजन विरोधी मानसिकता : अक्सर यह बात सामने आती है कि समाजवादी पार्टी अपने विधायकों और 
और बहुजन समाज के प्रतिभाशाली जनप्रतिनिधियों का उतना ध्यान नहीं रखती जितनाहोना चाहिए 

UP Politics: माता प्रसाद पांडे को बनाया नेता प्रतिपक्ष | Akhilesh ...30 Jul 2024 — लगातार तेजी के साथ डटे हुए हैं और इस दिशा में उन्होंने एक और मास्टर. स्ट्रोक लगाया दरअसल उन्होंने विधान विधानसभा में नेता प्रतिपक्...
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By appointing Pandey as LoP, Akhilesh has BJP in a bindTranslated — After making a dent in its OBC and non-Jatav Dalit vote bank, the SP is now seeking a slice of BJP's upper caste base. ... The app...The Hindu
Caste balance, non-controversial, seniority, acceptabilityTranslated — Subscription starts at just ₹500 a month. * Subsequently, Akhilesh announced Pandey's name as the LoP along with Mehboob Ali, Kama...ThePrint
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समाजवादी पार्टी का पीडीए और बहुजन विरोधी मानसिकता :


(ताकि सनद रहे!)
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श्री अखिलेश यादव जी!
मान्यवर !
आपके इस बयान पर नीचे जाकर मैंने टिप्पणियों को देखा, उन टिप्पणियों को देखने के बाद ऐसा लगा जैसे आज भी आपका पीडीए केवल नारा है !

यह बात सही है कि वर्तमान समय में पिछड़े वर्ग के लोगों से ही केंद्र की सत्ता व राज्य की सत्ता उन लोगों के हाथ में है जो अकेले पिछड़े वर्ग का नहीं दलित और तमाम उन लोगों का जिन लोगों का भला संविधान से संभव है उनको अंधभक्त बनाकर मनुस्मृति की व्यवस्था से धीरे-धीरे समृद्ध करते जा रहे हैं। 
उन्हीं के लोग ना तो केंद्र में और नहीं प्रदेश में और न हीं देश के और किसी हिस्से में "यादव" नेतृत्व के साथ खड़े होते दिखाई देना तो दूर इन्हें अछूत बनाने पर लगे हुए हैं ! यहां तक की कई बार वर्तमान सत्ता की अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक मानसिकता की सोच से जाति,धर्म और संप्रदाय को जिस भेदभाव से देश में आम आदमी की मानसिक सोच बदलने में जितना बड़ा षड्यंत्र कर चुके हैं और निरंतर कर रहे हैं ? 
उससे भी आगे जाकर एक जाति विशेष के खिलाफ हर तरह के षडयंत्र कर रहे हैं ; जिसमें बहुजन समाज के अनेक लोगों को मैं जानता हूं जो मानसिक रूप से उनकी इसी विचारधारा के पोषक हैं। 
जिस गौरवशाली "यादव समाज" के योगदान को आज बहुजन समाज भूल गया है उस समाज के जिस विघटनकारी रूप का नजारा बिहार में देखने को मिला है, कमोबेस वही काम उत्तर प्रदेश में भी किया जा रहा है। इसका मुकाबला करने में जो सबसे बड़ा नुकसान सामने आ रहा है वह "अदृश्य" है। 
यह "अदृश्य" क्या है यही सबसे बड़ा सवाल इस समय का है। 
जिसमें प्रमुख रूप से बहुजन बुद्धिजीवियों; नेताओं; व्यापारियों; लालची और स्वार्थी लोगों का बहुत बड़ा समूह जो दिखाई दे रहा है ? जिसे भौकाल बनाकर अंधविश्वास-पाखंड में अखंड गहराई तक डूबा हुआ है! वही "अदृश्य" समूह सबसे बड़ा नुकसान करने वाला समाज है। 
यह समाज सांस्कृतिक रूप से गुलाम हो चुका है इसकी गुलामी के पीछे जितनी बड़ी साजिश है उस साजिश को समाप्त करने के लिए समाज में ना तो पेरियार हैं, ज्योतिबा फूले हैं, ललई सिंह यादव हैं, रामस्वरूप वर्मा है, राम सेवक यादव हैं और न ही कथित रूप से दलित आंदोलन के जनक बाबा साहब अंबेडकर के विचारों के समग्र रूप से मानने वाले अंबेडकरवादी ही नजर आ रहे हैं। 
ऐसे समाज से लड़ने के लिए "पीडीए" का नारा कितना कारगर होगा ! 
इस पर प्रश्नचिन्ह लगता हुआ दिखाई दे रहा है। 
मनुवादी सोच के समाजवादी मूलत: इस लड़ाई को लड़ने में उसके साथ ज्यादा है जिससे पीडीए सत्ता लेना चाहता है।
यह केवल मेरी चिंता नहीं है बल्कि उन सभी लोगों की चिंता है जो आपके हितैषी हैं पर स्वार्थी और चाटुकार नहीं !
जिस आंदोलन की जरूरत है उस आंदोलन के वैचारिक लोगों को वैचारिक रूप से अवाम को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल नहीं लगाने की जरूरत है।
यह कैसे होगा चिंता इसी बात की है।
-डॉ लाल रत्नाकर 
(पिछड़े वर्ग के लिए आपकी चिंता जायज है जो भाजपा के क्रियाकलाप को आप समाज के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं वह वह समझ नहीं सकता न ही समझता और ना ही समझना चाहता है)