शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

समाजवादी चिंतन के बदलते रूप ; परिवार में समाजवाद

समाजवादी चिंतन के बदलते रूप ; परिवार में समाजवाद 
(अखबारोंकी कतरनों से)

तस्वीरों की जुबानी, 'नेताजी' के 'राजनीतिक कुनबे' की दिलचस्प कहानी
(दैनिक भाष्कर से साभार; "तो आइए जानते हैं देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे के सदस्यों की पॉलिटिकल कुंडली' साथ में...आगरा से सन्मय प्रकाश,लखनऊ से अनुराग तिवारी") ने ये आलेख तैयार किया है इसमें एक परिवार बड़ा होता दिखाई दे रहा है, मेरा मानना है कि नेता जी ने समाजवाद के लिए जितना किया है सम्भवतः वैचारिक रूप से किसी ने नहीं किया होगा। ऐसा कहने के पीछे नेता जी पर लग रहे परिवारवाद का सवाल उन उपलब्द्धियों को पी जाना है - डॉ लाल रत्नाकर 

तस्वीरों की जुबानी, 'नेताजी' के 'राजनीतिक कुनबे' की दिलचस्प कहानी
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव आज 75 साल के हो गए। देश की राजनीति में पूरे दमखम के साथ रहने वाले मुलायम एक जमाने में गांधी परिवार के परिवारवाद का विरोध करते रहे हैं। लेकिन आज उन पर ही राजनीति में परिवारवाद को बढावा देने का आरोप है। आज यूपी की कमान सपा प्रमुख मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश के हाथों में है। सिर्फ अखिलेश ही नहीं, मुलायम के परिवार की तीसरी पीढ़ी का भी अब राजनीति में दखल हो चुका है। यही नहीं, मुलायम परिवार की महिलाएं भी राजनीति में आगे बढ़ रही हैं। 
देश के इस सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे से कुल 13 लोग क्रमश: मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, अंशुल यादव, प्रेमलता यादव, अरविंद यादव, तेज प्रताप सिंह यादव, सरला यादव, अंकुर यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव राजनीतिक धरातल पर जोर-आजमाइश कर रहे हैं।
भारत की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला अब काफी बढ़ गया है। शायद ही कोई पॉलिटिकल पार्टी ऐसी हो, जिसमें परिवारवाद और वंशवाद की बेल दिखाई नहीं पड़ती हो। कांग्रेस से लेकर तमाम क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद की जड़ें काफी मजबूत हो गई हैं। काडर आधारित दलों जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों और भाजपा में परिवारवाद भले न दिखाई पड़े, पर दक्षिण की क्षेत्रीय पार्टियां हों या उत्तर भारत के अनेकानेक दल, सभी में परिवारवाद और वंशवाद मजबूत होता चला गया है।
परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए कभी अच्छा नहीं समझा गया, लेकिन तथ्य यह है कि कांग्रेस में ही इस प्रवृत्ति की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे यह संक्रामक हो गई। कांग्रेस के अलावा यह प्रवृत्ति समाजवादी कहे जाने वाले नेताओं और पार्टियों में भी दिखलाई पड़ती है। लालू हों या मुलायम या रामविलास पासवान, कोई भी राजनीति में कोई भी परिवारवाद और वंशवाद को आगे बढ़ाने के मोह से बच नहीं पाए। 
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मुलायम सिंह यादव
राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने की शुरुआत वैसे तो पं. जवाहरलाल नेहरू ने ही कर दी थी, पर लोहिया के चेले कहे जाने वाले मुलायम सिंह ने इसे खूब आगे बढ़ाया। पिछले कुछ वर्षों में जब भी देश में तीसरे मोर्चे की चर्चा होती है, मुलायम सिंह यादव का नाम सबसे पहले लिया जाता है। पेशे से शिक्षक रहे मुलायम सिंह यादव के लिए शिक्षा के क्षेत्र ने राजनीतिक द्वार भी खोले।
मुलायम सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के सैफई में 22 नवम्बर, 1939 को हुआ था। इनके पिता का नाम सुघर सिंह और माता का नाम मूर्ति देवी है। पांच भाइयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह के दो विवाह हुए हैं। पहली शादी मालती देवी के साथ हुई। उनके निधन (2003) के पश्चात उन्होंने साधना गुप्ता से विवाह किया। अखिलेश यादव मालती देवी के पुत्र हैं, जबकि मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव को उनकी दूसरी पत्नी ने जन्म दिया है। वर्ष 1954 में पंद्रह साल की किशोरावस्था में ही मुलायम के राजनीतिक तेवर उस वक़्त देखने को मिले, जब उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर 'नहर रेट आंदोलन' में भाग लिया और पहली बार जेल गए। 
डॉ. लोहिया ने फर्रुखाबाद में बढ़े हुए नहर रेट के विरुद्ध आंदोलन किया था और जनता से बढ़े हुए टैक्स न चुकाने की अपील की थी। इस आंदोलन में हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए। इनमें मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। इसके बाद वे 28 वर्ष की आयु में 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जसवंत नगर क्षेत्र से विधानसभा सदस्य चुने गये। इसके बाद तो वे 1974, 77, 1985, 89, 1991, 93, 96 और 2004 और 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्य चुने गए। इस बीच वे 1982 से 1985 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य और नेता विरोधी दल रहे। पहली बार 1977-78 में राम नरेश यादव और बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री बनाए गए। इसके बाद से ही वे करीबी लोगों के बीच मंत्री जी के नाम से जाने जाने लगे।
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मुलायम सिंह यादव पहली बार 5 दिसंबर, 1989 को 53 वर्ष की उम्र में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। लेकिन बीजेपी की रामजन्मभूमि यात्रा के दौरान उनके और भारतीय जनता पार्टी के संबंधों में दरार पैदा हो गई। इसका कारण था मुलायम सिंह यादव द्वारा आडवाणी की इस यात्रा को सांप्रदायिक करार दिया जाना और इसे अयोध्या नहीं पहुंचने देने की जिद पर अड़ जाना। 2 नवंबर, 1990 को अयोध्या में बेकाबू हो गए कारसेवकों पर यूपी पुलिस को गोली चलने का आदेश देकर मुलायम विवादों में आ गए। इस फायरिंग में कई कारसेवक मारे गए थे। हालांकि, अभी हाल में ही उन्होंने अपने इस फैसले पर अफ़सोस भी जताया है। 
मुलायम सिंह यादव 1989 से 1991 तक, 1993 से 1995 तक और साल 2003 से 2007 तक तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चुके हैं। वर्ष 2013 में एक बार फिर जब उनके मुख्यमंत्री बनने का मौका आया तो वे केंद्र सरकार में अपना महत्वपूर्ण रोल देख रहे थे और इसी वजह से उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव के हाथों में उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी। वैसे, मुलायम 1996 से ही केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए थे और उन्होंने अपनी महत्ता भी अन्य राजनैतिक पार्टियों को समझा दी थी। मुलायम सिंह यादव 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में लोकसभा के सदस्य चुने गये।

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मुलायम को 1977-78 में जब पहली बार मंत्री बनाया गया तो उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। इससे न केवल प्रदेश को फायदा हुआ, बल्कि समाजवादी पार्टी में परिवारवाद की नींव भी उसी समय पड़ी। बतौर उत्तर प्रदेश के सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री मुलायम सिंह यादव ने पहले किसानों को एक लाख क्विंटल और उसके दूसरे साल 2।60 लाख क्विंटल बीज बंटवाए। उनके इसी कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में डेयरी उत्पादन बढ़ा। मुलायम ने समाजवाद के साथ जो शुरुआत की, वह आगे चलकर परिवारवाद को बढ़ावा देने का कारण बना। मुलायम के इस सहकारिता आंदोलन के चलते उनके सबसे छोटे भाई शिवपाल को राजनीति में आने का रास्ता मिला। 
सहकारी क्षेत्र में अपनी पैठ बनाते हुए 1988 में शिवपाल पहली बार इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए। 13 वर्षों तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद 1991 में दो वर्षों के लिए यह पद शिवपाल से दूर रहा और वह दोबारा 1993 में सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। शिवपाल पिछले 20 वर्षों से इस पद पर बने हुए हैं। शिवपाल की पत्नी सरला भी 2013 में जिला सहकारी बैंक की राज्य प्रतिनिधि के रूप में लगातार दूसरी बार चुनी गई हैं। यही नहीं शिवपाल के बेटे आदित्य यादव उर्फ अंकुर को भी उत्तर प्रदेश प्रादेशिक को-ऑपरेटिव फेडरेशन का निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया है।
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मुलायम के सिर पर वर्ष 1992  में एक और सेहरा बंधा जब 5 नवम्बर, 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की स्थापना की गई। भारत के राजनैतिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण अध्याय था, क्योंकि लगभग डेढ़-दो दशकों से हाशिये पर जा चुके समाजवादी आंदोलन को मुलायम ने पुनर्जीवित किया था। इसके अगले वर्ष ही 1993 में हुए विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी का गठबंधन बीएसपी से हुआ। हालांकि, इस गठजोड़ को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन जनता दल और कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 
इस बार उत्तराखंड के निर्माण को लेकर भी उन्हें कई विवादों का सामना करना पड़ा। अलग राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारी 1 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए जा रहे थे, उस दौरान यूपी पुलिस ने मुज़फ्फरनगर जिले के रामपुर तिराहे के पास आंदोलनकारियों पर गोली चला दी। इसमें आंदोलनकारियों की मौत हो गई। साथ ही, पुलिस पर कुछ महिलाओं के साथ छेड़खानी और बलात्कार के आरोप भी लगे। इससे पूर्व मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश लोकदल और उत्तर प्रदेश जनता दल के अध्यक्ष भी रहे। मुलायम सिंह यादव 1996 से 1998 तक एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकारों में भारत के रक्षामंत्री के पद पर भी रहे।

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कुछ अनछुए पहलू...
मशहूर पत्रकार स्वर्गीय अलोक तोमर ने अपने संस्मरण में लगभग 42 वर्ष पुरानी घटना का जिक्र करते हुए एक जगह लिखा है, "उन दिनों बलरई में सहकारी बैंक खुला। ये चालीस साल पुरानी बात है। मास्टर मुलायम सिंह चुनाव में खड़े हुए और इलाके के बहुत सारे अध्यापकों और छात्रों के माता-पिताओं को पांच-पांच रुपए में सदस्य बना कर चुनाव भी जीत गए। उनके साथ बैंक के निदेशक पद का चुनाव मेरे स्वर्गीय ताऊ जी ठाकुर ज्ञान सिंह भी जीते थे। चुनाव के बाद जो जलसा हो रहा था, उसमें गोली चल गई। मुलायम सिंह यादव और मेरे ताऊ जी बात कर रहे थे और छोटे कद के थे। गोली चलाई तो मुलायम सिंह पर गई थी, मगर पीछे खड़े एक लंबे आदमी को लगी जो वहीं ढेर हो गया।"
इसी तरह एक और दिलचस्प किस्सा मुलायम सिंह यादव के बारे में सुनने को मिलता है कि वर्ष 1960 में मैनपुरी के करहल स्थित जैन इंटर कॉलेज में एक कवि सम्मेलन चल रहा था। जैसे ही उस समय के विख्यात कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' ने अपनी चर्चित रचना 'दिल्ली की गद्दी सावधान' सुनानी शुरू की, एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनसे माइक छीन कर कहा कि सरकार के खिलाफ कविताएं पढना बंद करो। इसी बीच उसी समय एक लड़का बड़ी फुर्ती से मंच पर चढ़ा और उसने इंस्पेक्टर को मंच पर ही उठाकर पटक दिया। बाद में लोगों ने पूछा कि ये यह साहसी नौजवान कौन था तो पता चला कि वह मुलायम सिंह यादव हैं। बाद में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने तो उन्होंने दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा।
मुलायम सिंह कब किससे नाराज हो जाएं और कब किसे समर्थन दे बैठें, शायद उन्हें भी इसका अंदाजा नहीं रहता। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने यूपीए समर्थित उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का वादा किया, लेकिन वोटिंग के समय उन्होंने उनके विरोधी पीए संगमा के नाम के आगे निशान लगा दिया। इसके चलते उनका मत रद्द हो गया। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इससे मुलायम सिंह यादव ने दोनों पक्षों को साध लिया।
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अखिलेश यादव 
पिछले साल हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में एक अंडरकरंट चल रही थी, जिसे बड़े-बड़े प्रकांड राजनीतिज्ञ भी नहीं समझ सके। जब चुनाव परिणाम घोषित हुए, तब कहीं जाकर लोगों को इस अंडरकरंट का अंदाजा लगा। उस वक़्त मीडिया ने भी कांग्रेस के युवराज की जनसभाओं में जुट रही भीड़ पर अपना ध्यान केंद्रित कर रखा था। लेकिन एक शख्स चुपचाप पूरे प्रदेश में साइकिल यात्रा और रथयात्रा के जरिये लोगों को अपने से जोड़ रहा था। 
चुनाव परिणाम घोषित हुए और तेजी से बदलते घटनाक्रम में इस युवा को प्रदेश के मुख्यमंत्री के का ताज पहना दिया गया। अखिलेश यादव 15 मार्च, 2012 को उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के वक़्त एक उनके विरोधियों और छिपी चुनौतियों की एक अलग धारा बह रही थी, जिसे समझने में खुद अखिलेश नाकाम रहे। नतीजा आज प्रदेश में हो रही उथल-पुथल के रूप में सामने है।
समाजवादी पार्टी के जनक मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव का जन्म 1 जुलाई, 1973 को इटावा जिले के सैफई में हुआ था। मां मालती देवी का बचपन में ही देहांत हो गया था। अखिलेश ने प्राथमिक शिक्षा इटावा के सेंट मेरी स्कूल में पूरी की। आगे की पढाई के लिए उन्हें राजस्थान में धौलपुर स्थित सैनिक स्कूल भेजा गया। वहां से 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अखिलेश ने मैसूर के एसजे कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग की डिग्री ली। 
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इसके बाद वे एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर्स करने ऑस्ट्रेलिया चले गए। सिडनी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई खत्म करने के बाद अखिलेश वापस आकर अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ राजनीति में जुड़ गये। अखिलेश की शादी डिंपल यादव से 24 नवम्बर, 1999 को हुई। आज उनके तीन बच्चे अदिति, अर्जुन और टीना हैं। इनमें अर्जुन और टीना जुड़वां भाई-बहन हैं।
लोकसभा की वेबसाइट के अनुसार, अखिलेश ने अपने आपको राजनीतिज्ञ के अलावा किसान, इंजीनियर और समाजसेवी बताया है। अखिलेश वर्ष 2000 में 27 वर्ष की आयु में पहली बार लोकसभा के सदस्य बने थे। उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने उस समय कन्नौज और मैनपुरी दोनों जगहों से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगहों से विजयी भी रहे थे। बाद में मुलायम सिंह ने कन्नौज की सीट खाली कर दी और उपचुनाव में वहां से अखिलेश को टिकट दिया गया। 
अखिलेश कन्नौज से विजयी होकर लोकसभा पहुंचे। तब से अखिलेश 3 बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं। वर्ष 2009 में अखिलेश ने भी दो जगहों कन्नौज और फिरोजाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। वे भी दोनों जगहों से विजयी रहे। फिरोजाबाद की सीट उन्होंने अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए खाली कर दी। लेकिन अफ़सोस कि इस बार यह रणनीति काम न आई और डिंपल फिल्म स्टार और कांग्रेस के उम्मीदवार राज बब्बर से चुनाव हार गईं।
 
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वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों के लिए अखिलेश ने काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्होंने 6 महीनों में 10 हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की और  800 रैलियों को संबोधित किया। उनके प्रोफेशनल नजरिये के चलते सपा ने चुनावों में ज्यादातर प्रोफेशनली क्वालिफाइड लोगों को टिकट दिया ताकि, पार्टी की पहले वाली इमेज को बदला जा सके। इसी का नतीजा था कि सपा पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में सत्ता में वापस आई। इस बदलाव को परखते हुए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने भी मुख्यमंत्री के लिए अखिलेश का नाम प्रस्तावित किया, जो थोड़ी-बहुत अंदरूनी कशमकश के बाद सभी  ने स्वीकार कर लिया। मंत्रिमंडल में भी अखिलेश ने नयी और पुरानी, दोनों पीढ़ियों का समावेश किया।
अखिलेश यादव हालांकि अपने पिता मुलायम सिंह की छत्र-छाया में ही शासन चला रहे हैं, लेकिन उनके कुछ फैसले उनके लिए मुसीबत का सबब भी बन गए और उनकी अपरिपक्वता को भी दर्शा गए। उन्होंने डीपी यादव जैसे दागी नेताओं को पार्टी से दूर रखने का फैसला लिया तो उनकी चारो ओर सराहना हुई, लेकिन जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो कई दागी चेहरों के शामिल हो जाने चलते उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। हाल-फिलहाल में नोएडा के एसडीएम दुर्गा शक्ति के निलंबन का मामला भी सरकार और पार्टी, दोनों के लिए गले का फांस बन चुका है।
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कुछ रोचक पहलू
1. अखिलेश के घर का नाम टीपू है। बचपन में जब वे सेंट मेरी स्कूल में दाखिले के लिए पहुंचे तो उनके साथ न तो पिता मुलायम थे और न ही चाचा शिवपाल। उनके साथ पारिवारिक मित्र अवधबिहारी बाजपेयी और वकील गए थे। जब वहां अखिलेश से नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम 'टीपू' बता दिया। जब स्कूल वालों ने कहा कि यह नाम स्कूल में नहीं लिखा जा सकता तो वहीं उनका नाम टीपू से अखिलेश हो गया।
2. एक सभा के दौरान उत्तर प्रदेश में खेलों के विकास के लिए राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त रामवृक्ष यादव ने बताया कि अखिलेश यादव फ़ुटबाल बहुत अच्छा खेलते हैं। बचपन में फ़ुटबाल खेलते समय नाक पर फ़ुटबाल लग गया था। तभी से उनकी नाक टेढ़ी हो गई।
3. मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश के कैंप ऑफिस का स्टाफ उनके नाम आने वाले प्रेम पत्रों को लेकर काफी परेशान रहा। अधिकतर पत्रों में शादी का प्रस्ताव होता था और शादी न करने पर आत्महत्या की धमकी होती थी।
4. चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश की पजेरो गाडी में उनकी बीएमडब्ल्यू साइकिल रखी होती थी। इसका इस्तेमाल वो साइकिल रैली में करते थे।
5. पार्टी की छवि के उलट अखिलेश टेक्नोलॉजी को पसंद करते हैं। उनके पास चुनाव प्रचार के दौरान दो-दो ब्लैकबेरी फोन थे और वे आईपैड पर पार्टी के प्रचार अभियान का वीडियो देखते थे।
6. सरकार बनाने के बाद से उनके पिता और सपा सुप्रीमो उनकी कार्यशैली को लेकर कई बार नाराजगी जता चुके हैं।
7. अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद विदेशी मीडिया भी उनके व्यक्तित्व को लेकर काफी उत्साहित था। प्रदेश में निवेश के संभावनाओं को देखते हुए कई देशों का प्रतिनिधि मंडल उनसे लखनऊ और दिल्ली में मुलाक़ात कर चुका है।
8. अखिलेश यादव के 18 महीने के कार्यकाल में 2000 अधिकारियों का ट्रांसफर हो चुका है। गोरखपुर के एसएसपी रहे शलभ माथुर को तो 6 महीने के अंदर 4 बार ट्रांसफऱ ऑर्डर मिल चुके हैं।
9. मुख्यमंत्री बनने के बाद एक इंटरव्यू में अखिलेश यादव देश का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं।
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डिंपल यादव 
यूपी के सीएम अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज से चुनी गईं देश की पहली निर्विरोध सांसद डिंपल यादव किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। 1978 में पुणे में आर्मी कर्नल एससी रावत के घर जन्‍मीं डिंपल की शुरुआती पढ़ाई और पालन-पोषण पुणे, भटिंडा और अंडमान निकोबार में हुआ। इंटरमीडिएट के बाद डिंपल यादव ने लखनऊ विश्‍वविद्यालय से ह्यूमेनिटीज़ में स्नातक किया। यहीं अखिलेश यादव से उनकी मित्रता हुई। दोनों की मित्रता कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला। अखिलेश मरीन इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद ऑस्ट्रेलिया से लौटे तो दोनों ने शादी कर ली। विवाह के बाद डिंपल गृहिणी बन गईं और अखिलेश अपने पिता मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में शामिल होकर राजनीति में सक्रिय हो गये। 
डिंपल और अखिलेश के तीन बच्‍चे हैं - अदिति, अर्जुन और टीना। इनमें अर्जुन और टीना जुड़वां हैं। उनके पिता कर्नल रावत उत्तराखंड के उधमसिंह नगर के मूल निवासी हैं। वर्तमान में वहीं रह रहे हैं। डिंपल की दो बहनें हैं। कर्नल रावत के मुताबिक, शादी से पहले वह काफी बोल्ड हुआ करती थीं। अपनी बात बेबाकी से रखने वाली डिंपल कभी किसी बात को कहने में हिचकती नहीं थीं। अब शादी के बाद बेहद शांत स्वभाव की हो चुकीं डिंपल स्पोर्ट्स में काफी रुचि रखती हैं। घुड़सवारी उनको बेहद पसंद है। इसकी वजह से आज भी पहाड़ों पर जब जाने का मौका मिलता है तो घुड़सवारी ज़रूर करती हैं। 
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डिंपल की कॉलेज के दिनों की खास दोस्त लखनऊ में रही साक्षी ने दैनिक भास्कर.कॉम से खास बातचीत में कॉलेज के दिनों को याद करते हुए बताया कि उनमें किसी भी नई वस्तु और सोच को ग्रहण करने की क्षमता अपार है। वह किसी भी नई जगह पर जल्द ही वहां के वातावरण और हालत को ग्रहण कर लेती थीं। कॉलेज के दिनों में पढने- लिखने के साथ-साथ घूमने-फिरने का भी शौक था। कभी उनको इसके लिए डांट भी खूब पड़ती थी। डिंपल किसी भी दोस्त की मदद के लिए हमेशा खड़ी रहती थीं। शायद पिता आर्मी में थे और कई जगह वह रह चुकी थीं, इसका भी असर उनमें दिखाई पड़ता था। 
डिंपल और साक्षी में पहले जितनी मुलाकातें हो जाती थीं, उतनी अब नहीं हो पाती हैं। डिंपल को घर और बाहर, दोनों जगह का काम संभालना पड़ता है। इसलिए उनकी व्यस्तता पहले से ज्यादा बढ़ गई है। वह भले ही सांसद और सीएम की पत्नी हों, लेकिन उनके स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया है। वह आज भी उसी तरह हैं, जैसी कॉलेज के दिनों में थीं। डिंपल के इस दोस्त ने बातों-बातों में चौंकानी वाली एक बात बताई। उनके मुताबिक, डिंपल यादव को मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी और प्रतीक की मां से कुछ खास लगाव नहीं है। प्रतीक और उसकी पत्नी से ठीक-ठाक रिश्ते रहते हैं। नेताजी की लाडली बहू डिंपल उनका ख्याल खूब रखती हैं। भले ही पार्टी नेता जी और अखिलेश यादव चला रहे हैं, पर फैमिली बिज़नेस वही देखती हैं।
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12 जून, 2012 को डिंपल यादव को संसद का टिकट मिल गया। अब उनकी असली राजनीतिक पारी शुरू हो चुकी थी। हालांकि, इससे पहले भी उन्‍होंने राजनीति में अपनी किस्मत फिरोजाबाद संसदीय सीट से आजमायी थी। वह सीट भी अखिलेश ने छोड़ी थी। इस पर फ़िल्म अभिनेता राज बब्‍बर जीते थे। खैर, पिछली हार जैसी भी रही हो, इस बार की जीत किसी बड़ी जीत से कम नहीं थी, क्‍योंकि किसी भी पार्टी ने उनके विरुद्ध प्रत्‍याशी उतारने की हिम्‍मत नहीं की और वह निर्विरोध जीतीं। 
डिंपल यादव ने जनता के समक्ष पारदर्शिता दिखाते हुए पति के मुख्‍यमंत्री बनते ही अपनी संपत्ति की घोषणा की। यही नहीं, राज्‍य सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर अपनी संपत्ति का ब्‍योरा अपलोड किया। इसके अनुसार, मार्च 2012 में उनके पास 59.76 लाख रुपए के जेवर, लखनऊ में 41 लाख और 39.75 लाख रुपए की संपत्तियां हैं। साथ ही, उनके बैंक अकाउंट में 79.66 लाख और दूसरे अकाउंट में 2 लाख रुपए थे। साथ ही, उन्‍होंने 15 लाख रुपए का निवेश किया है। डिंपल यादव प्रदेश की पहली ऐसी महिला हैं, जिनके ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। यह तथ्य भी विशिष्टता लिए हुए है कि वह ऐसी सांसद हैं जिनके पति मुख्यमंत्री हैं।

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डिंपल को एक राजनेता से ज्यादा सीएम की पत्नी के रूप में जाना जाता है। उनको राजनीति विरासत में मिली है। पति की छोड़ी हुई सीट पर सांसद बनी हैं। वह न तो कोई राजनैतिक बयान देती हैं, न पार्टी मीटिंग में जाती हैं। हां, संसद सत्र के दौरान ससुर मुलायम के साथ ज़रूर दिख जाती हैं। डिंपल को बतौर पत्नी या मां के रूप में देखा जाये तो वो उसमें खरी उतरती हैं। अखिलेश भी स्वीकार करते हैं कि वह उनका और बच्चों का भरपूर ख्याल रखती हैं। एक कुशल गृहिणी की तरह पूरे परिवार का ख्याल रखती हैं। डिंपल सुबह मॉर्निंग वॉक और योगा से दिनचर्या की शुरुआत करती हैं। बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजती हैं। उसके बाद अपने निर्देशन में घर का नाश्ता तैयार करवाती हैं। अखिलेश और नेताजी सहित पूरा परिवार एक साथ नाश्ता और खाना खाता है। चाईनीज़ खाने की शौकीन डिंपल घर से बाहर कम ही जा पाती हैं, लेकिन देवरानी के साथ किचन में ही हर शौक पूरा करती हैं। वह हर साल अपने मम्मी-पापा से मिलने जरूर जाती हैं।
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रामगोपाल यादव
प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। पेशे से अध्यापक रहे श्री यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के थिंक टैंक भी कहे जाते हैं। यादव परिवार में सबसे पढ़े-लिखे केवल प्रो. रामगोपाल यादव ही हैं। प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रींय महासचिव और राज्य सभा सांसद हैं। वह पार्टी में मजबूत हैसियत रखते हैं। हालांकि, उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय बड़े भाई मुलायम सिंह यादव को जाता है। रामगोपाल यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के साथ 1988 में राजनीति में कदम रखा। वह इटावा के बसरेहर ब्लॉक प्रमुख का चुनाव जीते। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 
प्रो. रामगोपाल ने वर्ष 1989 में जिला परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष की कुर्सी थामी। वर्ष 1992 में राज्यसभा के सदस्ये बने। इसके बाद रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंच रहे हैं। अब भी राज्यसभा के सदस्य हैं। वह मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। हाल ही में आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में केंद्र सरकार द्वारा रिपोर्ट मांगने पर रामगोपाल यादव ने तो यहां तक कह दिया कि यूपी को आईएएस की जरूरत ही नहीं है। इस बयान को विश्लेषक यूपी सरकार और समाजवादी पार्टी में उनकी बड़ी हैसियत के रूप में लेते हैं।
 
तस्वीरों की जुबानी, 'नेताजी' के 'राजनीतिक कुनबे' की दिलचस्प कहानी
प्रो. रामगोपाल यादव को जन्मर 29 जून, 1946 को इटावा के सैफई में हुआ। उनका विवाह 4 मई, 1962 को फूलन देवी से हुआ। उनके तीन बेटे और एक बेटी है। बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए प्रो. रामगोपाल ने काफी मेहनत कर पढ़ाई की। परिवार में वह एकमात्र सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे सदस्य हैं। रामगोपाल यादव ने एमएससी (भौतिकी), एमए (राजनीति विज्ञान) किया। बाद में उन्होंने ‘डॉ. लोहिया का सा‍माजिक और राजनीतिक दर्शन’ विषय पर शोध किया और पीएचडी उपाधि ली। 
उनकी उच्च शिक्षा कानपुर विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालय में पूरी हुई। बेहद गरीबी में पले-बढ़े प्रो. रामगोपाल यादव की संपत्ति नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के अनुसार 1.28 करोड़ रुपए से अधिक है। इनमें से 98 लाख रुपए की संपत्ति जमीन-जायदाद व भवन के रूप में है, जबकि करीब 22 लाख रुपए के गहने, बॉन्ड, फिक्स डिपोजिट व बैंकों में जमा रकम है। उन पर 1.26 लाख रुपए का कर्ज भी है। वह डॉ. राममनोहर लोहिया ट्रस्ट  के सचिव हैं।
प्रो. रामगोपाल यादव 1969 में केके पीजी कॉलेज में फिजिक्स के लेक्च्रर बने। बाद में उन्होंने राजनीतिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष के तौर पर शिक्षण कार्य किया। इसके बाद वह चौधरी चरण सिंह डिग्री कॉलेज के प्राचार्य रहे। कहा जाता है कि कोई बड़ा फैसला लेते समय मुलायम सिंह यादव प्रो. रामगोपाल से सलाह लेते हैं।
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शिवपाल सिंह यादव 
नाम शिवपाल सिंह यादव जन्मतिथि 06 अप्रैल, 1955 शैक्षिक योग्यता बी.ए., बी.पी.एड. पिता स्व. श्री सुघर सिंह यादव माता स्व. श्रीमती मूर्ति देवी पत्नी श्रीमती सरला यादव संतान पुत्र -एक पुत्री -एक ,मुलायम के पांच भाइयों में सबसे छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। ‘‘शिवपाल  बड़े तेज-तर्रार थे। शिवपाल को छोड़कर मुलायम के किसी भाई का राजनीति में जाने का इरादा नहीं किया। शिवपाल दैनिक भास्कर डॉट कॉम से बातचीत में बताते हैं कि 70 के दशक में चंबल के बीहड़ जिले इटावा में राजनीति की राह आसान नहीं थी। 1967 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह के राजनैतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। राजनैतिक द्वेष के चलते कई बार विरोधियों ने मुलायम सिंह पर जानलेवा हमला भी कराया। यही वह समय था, जब हम शिवपाल सिंह और चचेरे भाई रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के साथ आए। शिवपाल ने मुलायम सिंह की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभाली।
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शिवपाल ने बताया कि मुलायम सिंह के जीवन पर लिखी अपनी किताब 'लोहिया के लेनिन' में मैंने इसका जिक्र भी किया है, ‘‘नेता जी जब भी इटावा आते, मैं अपने साथियों के साथ खड़ा रहता। हम लोगों को काफी सतर्क रहना पड़ता, कई रातें जागना पड़ता था।’’ मुलायम सिंह के नज़दीकी रिश्तेदारों में रामगोपाल यादव इटावा डिग्री कॉलेज में फिजिक्स पढ़ाते थे। इसीलिए लोग इन्हें ‘प्रोफेसर’ कहने लगे। वे कहते हैं, ‘‘सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे होने के कारण रामगोपाल रणनीति बनाने और कागजी लिखा-पढ़ी में मुलायम सिंह की मदद करते थे और मैं नेताजी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालता था।" शिवपाल ने बताया कि 1988 में रामगोपाल और शिवपाल सिंह ने एक साथ राजनीति में कदम रखा। रामगोपाल इटावा के बसरेहर ब्लाक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तो शिवपाल इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद 1992 में रामगोपाल राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए तो मैं पहली बार 1996 में जसवंतनगर से जीतकर विधानसभा पंहुचा। इसके बाद रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंच रहे हैं और मैंने अपनी विधायकी सफलतापूर्वक बरकरार रखी है।
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शिवपाल सिंह यादव ने मुलायम सिंह यादव के सहकारिता मंत्री रहते हुए पहली बार 77-78 में किसानों को एक लाख क्विंटल और अगले वर्ष 2.60 लाख क्विंटल बीज बांटे थे। उनके कार्यकाल में प्रदेश में दूध का उत्पादन तो बढ़ा ही, साथ ही पहली बार सहकारिता में दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की भी व्यवस्था की गई। सहकारिता आंदोलन में मुलायम के बढ़े प्रभाव ने ही शिवपाल के लिए राजनीति में प्रवेश का मार्ग खोला।
1988 में शिवपाल पहली बार जिला सहकारी बैंक, इटावा के अध्यक्ष बने। 1991 तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद दोबारा 1993 में शिवपाल ने यह कुर्सी संभाली और अभी तक इस पर बने हुए थे। 1996 से विधानसभा सदस्य के साथ-साथ आज कई शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधन भी करते हैं। वे एस एस मेमोरियल पब्लिक स्कूल, सैफई, इटावा के अध्यक्ष चुने गए। चौ. चरण सिंह पी जी कॉलेज, हैवरा, इटावा प्रबंधक, डॉ. राममनोहर लोहिया इंटर कॉलेज, धनुवां, इटावा प्रबंधक, डॉ. राम मनोहर लोहिया इंटर कॉलेज, बसरेहर, इटावा प्रबंधक, जन सहयोगी कन्या इंटर कॉलेज, बसरेहर, इटावा प्रबंधक, डॉ. राममनोहर लोहिया, माध्यमिक हाई स्कूल, गीजा, इटावा प्रबंधक, मनभावती जन सहयोगी इंटर कॉलेज, बसरेहर, इटावा पूर्व पद कैबिनेट मंत्री, कृषि एवं कृषि शिक्षा, कृषि विपणन, पी.डब्ल्यू.डी., ऊर्जा एवं भूतत्व खनिकर्म अध्यक्ष, मंडी परिषद अध्यक्ष, जिला सहकारी बैंक, इटावा निदेशक, पी.सी.एफ. प्रमुख महासचिव, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष, जिला पंचायत, इटावा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड, लखनऊ विधानसभा, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा विमुक्त जातियों संबंधी संयुक्त समिति सदस्य (1997-98) अभिरुचि समाज सेवा एवं राजनीति व्यवसाय कृषि निर्वाचन क्षेत्र 289, जसवंतनगर, जनपद इटावा के साथ-साथ प्रदेश में लोक निर्माण, सिंचाई ,राजस्व ,गन्ना जैसे महत्वपूर्ण विभागों की ज़िम्मेदारी भी है।
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धर्मेंद्र यादव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह के बड़े भाई अभय राम के बेटे हैं। वह इस वक्त बदायूं से सांसद हैं और इससे पहले मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीत चुके हैं। तब वह 14वीं लोकसभा के सबसे युवा सांसद थे। धर्मेंद्र यादव का राजनीति से नाता छात्र जीवन के समय से ही है। इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान समाजवादी जनेश्वर मिश्र के सानिध्य में उन्होंने छात्र राजनीति की। इलाहाबाद में सपा का परचम लहराने का श्रेय जनेश्वर मिश्र को जाता है तो उनके सहायक के तौर पर धर्मेंद्र का भी नाम लिया जाता है।
जब धर्मेंद्र एमए की पढ़ाई पूरी करने वाले थे, तभी वर्ष 2003 में मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सैफई बुला लिया। तब धर्मेंद्र के चचेरे भाई व सैफई ब्लॉक प्रमुख रणवीर सिंह का हार्ट अटैक से अचानक मौत हो गई थी। उस समय स्थानीय राजनीति को संभालने का दायित्व मुलायम सिंह ने धर्मेंद्र को दिया। सैफई महोत्सव के सचिव वेदव्रत गुप्ता कहते हैं कि उस समय सैफई को संभालने वाला धर्मेंद्र की टक्कर का कोई नहीं था। वह 2003 में सैफई ब्लॉक प्रमुख के पर पर निर्वाचित हुए। तब मुलायम सिंह यादव मैनपुरी लोकसभा सीट से सांसद थे। 
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वर्ष 2004 में मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश का मुख्ययमंत्री बनने पर यह सीट छोड़ दी। तब धर्मेंद्र यादव उपचुनाव में डेढ़ लाख वोट से जीतकर मैनपुरी से सांसद बने। मैनपुरी से लोकसभा उपचुनाव जीतने वाले धर्मेंद्र यादव महज 25 वर्ष की आयु में सांसद बन गए। तब वह 14वें लोकसभा के सबसे युवा सांसद थे। बाद में वह वर्ष 2009 में दोबारा बदायूं से चुनाव लड़े और जीते। धर्मेंद्र यादव वर्ष 2005-2007 तक यूपी को-ऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन रहे। माफिया डॉन डीपी यादव के राजनैतिक कॅरियर पर विराम लगाने का श्रेय भी धर्मेंद्र यादव को जाता है। 
डीपी यादव वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त आजम खां के माध्यम से सपा में आने का रास्ता ढूंढ लिया था। इसे लेकर काफी राजनीतिक रस्साकशी हुई। तब समाजवादी पार्टी के युवा सांसद धर्मेन्द्र यादव की जिद के चलते डीपी यादव को पार्टी में एंट्री नहीं मिल सकी। इसकी वजह से कुछ वक्त तक आजम खां नाराज भी रहे थे। विधानसभा चुनाव में धर्मेंद्र यादव की बदौलत बदायूं के मतदाताओं ने सपा के पांच उम्मीदवारों को विधायक बनाया। 
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धर्मेंद्र यादव की आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई सैफई में हुई। इसके बाद शिक्षा के लिए वह इलाहाबाद चले गए। यहां छात्र राजनीति की और युवा नेतृत्व को उभारने का मौका दिया। धर्मेंद्र ने एलएलबी और राजनीति विज्ञान से एमए की पढ़ाई की हुई है। धर्मेंद्र का विवाह नीलम यादव से हुआ है। नेशनल इलेक्शन वॉच के मुताबिक धर्मेंद्र यादव के पास 56 लाख रुपए की संपत्ति है, जबकि 98 हजार रुपए का कर्ज है। 
उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान विषय में एमए किया है। उन्होंने यह डिग्री और मैनपुरी से लोकसभा चुनाव की जीत एक साथ वर्ष 2004 में पाई। अक्टूबर 2012 में धर्मेंद्र यादव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में संबोधन दिया था। रणवीर सिंह सैफई महोत्सव के अध्य्क्ष धर्मेंद्र यादव हैं।
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अक्षय यादव
मुलायम सिंह के खानदान के सातवें राजनेता अक्षय यादव हैं। वह सपा महासचिव रामगोपाल यादव के बेटे और मुलायम सिंह यादव के भतीजे हैं। अक्षय ने एमबीए किया है और बीज का कारोबार संभाल रहे हैं। पिछले चार साल से फिरोजाबाद में कार्यकर्ताओं के साथ वक्त बिता रहे हैं। 26 वर्षीय अक्षय यादव को समाजवादी पार्टी ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट ने सपा ने टिकट दिया है। इस सीट से अक्षय का पुराना नाता है। 
पिछले पांच साल से इस इलाके में वह काम कर रहे हैं। जब अखिलेश यादव ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद और कन्नौकज से चुनाव लड़ा था, उस समय फिरोजाबाद के चुनाव प्रबंधन की कमान अक्षय यादव ने संभाली थी। इसके बाद अखिलेश ने फिरोजाबाद सीट छोड़ दी और उपचुनाव में पत्नी डिंपल यादव को खड़ा किया। अपनी भाभी डिंपल का चुनाव प्रबंधन भी अक्षय ने संभाला था। लेकिन कांग्रेस नेता व सिनेस्टार राज बब्बर ने डिंपल को हरा दिया। बाद में वर्ष 2012 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में अक्षय ने ही चुनाव प्रबंधन किया।
 
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अक्षय यादव कहते हैं कि वह फिरोजाबाद में डिंपल भाभी की हार का बदला लेंगे। 2009 में उनके पिता ने डिंपल यादव को खड़ा करवाया था, लेकिन अफसोस कि वहां से जीत नहीं मिल सकी। अब पापा का मन है कि इस इलाके को फिर से जीत लिया जाए। इटावा और मैनपुरी से फिरोजाबाद की सीमा लगी हुई है। यदि वह चुनाव जीतते हैं तो अगले लोकसभा में सबसे युवा सांसद होंगे। चूड़ी निर्माण के लिए मशहूर फिरोजाबाद सीट मुलायम सिंह के परिवार की पारंपरिक संसदीय सीट रही है। 
इस बार अक्षय यादव अधिकतर वक्त फिरोजाबाद में बिता रहे हैं। यहां बेहतर स्थिति है। फिरोजाबाद संसदीय क्षेत्र से सीधा मुकाबला कांग्रेस के प्रत्याशी व सिनेस्टार राज बब्बर से है। बसपा अब तक यहां से दो प्रत्याशी बदल चुकी है। बसपाई आरोप लगा रहे हैं कि सपा के दबाव में उनके प्रत्याशियों को प्रताडि़त किया जा रहा है। अक्षय यादव सीधे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में शामिल हो रहे हैं, जबकि इस यादव परिवार के अधिकतर सदस्य स्थानीय राजनीति से उठकर राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं।
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अक्षय यादव समाजवादी पार्टी महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव के सबसे छोटे बेटे हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई इटावा के सैफई में हुई। बाद में उच्च शिक्षा दिल्ली में पूरी की। उनकी शादी ऋचा यादव से हुई। उनकी एक बेटी भी है। पढ़ाई पूरा होने के बाद करीब तीन साल पहले अक्षय वापस सैफई आ गए। उन्होंने यहां बीज संयंत्र लगाया। बीज का कारोबार अच्छा चल रहा है। अब वह बिजनेस के साथ-साथ राजनीति में भी कदम रख चुके हैं। अक्षय का सबसे बड़ा शौक रायफल शूटिंग है। वह पढ़ाई के दौरान कई बार राष्ट्रीय शूटिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं।
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अंकुर यादव 
प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के पुत्र 25 वर्षीय आदित्य यादव उर्फ अंकुर उत्तर प्रदेश प्रादेशिक को-ऑपरेटिव फेडरेशन (यूपीपीसीएफ) के निर्विरोध अध्यक्ष हैं। . सफेद कुर्ता-पाजामा से इतर पैंट, शर्ट, कोट और हाथ में महंगी रोलेक्स घड़ी पहने बीटेक डिग्रीधारी आदित्य समाजवाद के बदलते चेहरे की ओर इशारा कर रहे हैं। राजनीति में सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ने के लिए आदित्य ने अपने पिता शिवपाल सिंह यादव के पद-चिन्हों पर चलते हुए सहकारिता का सहारा लिया है। खुद शिवपाल सिंह ने भी इटावा जिले के सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद से सियासी पारी की शुरुआत की थी। यूपीपीसीएफ का अध्यक्ष बनने के साथ ही आदित्य का नाम मुलायम सिंह परिवार के उन सदस्यों की सूची में 13वें नंबर पर शुमार हो गया है, जो राजनीति में एंट्री कर चुके हैं। हालांकि, आदित्य तीन वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं और 2010 में वे जसवंतनगर ब्लॉक से इटावा जिला विकास परिषद का चुनाव भी लड़े, पर पहली बार बाजी हार गए।
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सहकारिता के माध्यम से ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। इसकी वजह जानने के लिए थोड़ा पृष्ठभूमि में जाना होगा। 1977 में यूपी में रामनरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उस सरकार में मुलायम सिंह यादव को पहली बार सत्ता सुख मिला और वे सहकारिता मंत्री बने। वहीं से प्रदेश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत हुई। मुलायम सिंह ने सहकारिता को नौकरशाही के चंगुल से निकालकर आम जनता से जोड़ा। उसी दौरान यूपी में सहकारी बैंक की ब्याज दर को 14 फीसदी से घटाकर 13 फीसदी और फिर 12 फीसदी कर दिया गया। तब से ये कहना गलत नहीं होगा कि मुलायम परिवार के पास ही सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद का दबदबा बना रहा। अंकुर यादव यूपी को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड (पीसीएफ) के सभापति पद पर बने हुए हैं और उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिला हुआ है। बेहद शांत स्वभाव के हैं अंकुर यादव। 
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अंशुल यादव
राजपाल और प्रेमलता से दो पुत्र हैं। एक हैं 26 साल के अंशुल यादव और दूसरे 19 साल के अभिषेक यादव। अंशुल यादव भी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अंशुल ने जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले ताखा ब्लॉक में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के चुनाव प्रचार की कमान संभाली। अंशुल यादव इटावा व भरथना विधानसभा क्षेत्र में जोर-आजमाइश में लगे हुए हैं। 
करीब दो साल से आम लोगों के बीच जा कर अंशुल यादव ने बूथ कमेटियों के गठन में प्रभावी भूमिका निभाई है। नोएडा से एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए पास करने के बाद राजनीति के मैदान में कूदे अंशुल यादव कहते हैं कि पार्टी की ओर से उनको जिस जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिये कहा गया है, उसी के तहत प्रचार का काम करने में लग गए हैं।
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वैसे, उन्‍हें फार्मूला वन रेस देखने का बेहद शौक है। यही कारण है कि भारत में पहली बार जब इस रेस का आयोजन हुआ तो अंशु भी दर्शक दीर्घा में रेस का लुत्‍फ उठाते नजर आए। इसके अलावा, उन्‍हें पढ़ने का भी काफी शौक है। घर में ही लाइब्रेरी बना रखी है।
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तेजप्रताप सिंह
इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी करके लौटे तेजप्रताप सिंह सक्रिय राजनीति में उतरने वाले मुलायम सिंह के परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुलायम के बड़े भाई रतन सिंह के बेटे रणवीर सिंह के बेटे तेजप्रताप सिंह यादव उर्फ तेजू इस समय सैफई ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए हैं। क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को मजबूत करने की पूरी जिम्‍मेदारी तेज प्रताप सिंह ने अपने कंधों पर उठा रखी है। परिवार के सदस्‍य इन्‍हें तेजू के नाम से भी पुकारते हैं। 
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सैफई के पहले ब्लॉक प्रमुख और सैफई महोत्सव के संस्थापक स्वर्गीय रणवीर सिंह यादव के बेटे तेजप्रताप यादव ने जसवंतनगर से अपने बाबा शिवपाल सिंह यादव की जीत में अहम योगदान दिया। सैफई से निर्विरोध ब्‍लॉक प्रमुख चुने जाने के बाद तेजप्रताप यादव ने पिछले विधानसभा चुनाव में काफी मेहनत की। क्षेत्र के लोग कहते हैं कि तेजप्रताप से पहले उनके पिता रणवीर सिंह यादव चुनाव की जिम्मेदारी निभाते थे। सैफई क्षेत्र की जनता को उन्‍हें बेहद प्‍यार मिलता था। लोग उन्‍हें दद्दू कहते थे। 
उनकी लोकप्रियता कुछ ऐसी थी कि रणवीर सिंह जिस गांव-गली मे चुनावी जनसंपर्क के लिए जाते, वहां की जनता में उन्‍हें सम्‍मानित करने होड़-सी लग जाती थी। जब तक रणवीर सिंह जीवित रहे, शिवपाल सिंह भी निश्चिंत रहते थे। रणवीर के निधन के बाद यह जिम्मेदारी धर्मेन्द्र यादव के कंधों पर आ गई और उन्हें सैफई का ब्लॉक प्रमुख बनाया गया। उन्होंने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। लेकिन बाद में वह मैनपुरी संसदीय क्षेत्र से सांसद हो गए। इसके बाद परिवार के लिए हमेशा से नाक का सवाल माने जाने वाले सैफई ब्‍लॉक पर तेजप्रताप यादव तेजू को खड़ा किया गया और वे यहां से निर्विरोध चुने गए। 
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बताते हैं कि तेजप्रताप यादव ने अपने बाबा शिवपाल यादव को चुनाव जिताने के लिए सैकड़ों गांवों में पैदल यात्रा की। क्षेत्र की जनता उनमें रणवीर का ही अक्‍स देखती है। उनके सरल और मृदुभाषी स्वभाव के चलते ही क्षेत्र में सैकड़ों लोगों बसपा छोड़कर सपा ज्‍वाइन की। पिता की तरह खादी का कुर्ता-पाजामा और सदरी पहने तेजप्रताप भी बड़े-बूढों, माताओं का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते।
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प्रेमलता यादव
मुलायम सिंह के छोटे भाई राजपाल यादव की पत्‍नी प्रेमलता यादव इस समय इटावा में जिला पंचायत अध्‍यक्ष हैं। आमतौर पर गृहिणी के तौर पर जीवन के अधिकतर वर्ष गुजारने के बाद 2005 में प्रेमलता यादव ने राजनीति में कदम रखा। यहां उन्‍होंने पहली बार इटावा की जिला पंचायत अध्‍यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत गईं। 2005 में राजनीति में आने के बाद ही प्रेमलता मुलायम परिवार की पहली महिला बन गईं, जिन्‍होंने राजनीति में कदम रखा। उनके बाद शिवपाल यादव की पत्‍नी और मुलायम की बहू डिंपल यादव का नाम आता है। 
प्रेमलता के पति राजपाल यादव इटावा वेयर हाउस में नौकरी करते थे और अब रिटायर हो चुके हैं। रिटायरमेंट के बाद से ही वह समाजवादी पार्टी में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। 2005 में चुनाव जीतने के बाद प्रेमलता ने अपना कार्यकाल बखूबी पूरा किया। इसके बाद 2010 में भी वह दोबारा इसी पद पर निर्विरोध चुनी गई हैं। वैसे, उनके निर्विरोध चुने जाने के दौरान उनके बेटे अंशुल यादव पर एक बसपा नेता पर मारपीट का आरोप भी लगा।
दरअसल, प्रेमलता यादव के खिलाफ चुनाव में खड़ी एक अन्‍य प्रत्‍याशी जब अपना नामांकन वापस लेने पहुंची, तो उसी दौरान एक बसपा नेता से उसकी बातचीत होने लगी। इसके बाद नेता ने आरोप लगाया कि अंशुल यादव ने अन्‍य साथियों के साथ मिलकर उनके साथ मारपीट की और उनके कपड़े फाड़ दिए।
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सरला यादव 
शिवपाल की पत्नी सरला यादव परिवार की पहली महिला सदस्य हैं, जिन्होंने राजनीति में कदम रखा है। शिवपाल बताते हैं कि उस समय कुछ मज़बूरी ही ऐसी थी कि पत्नी को राजनीति में उतारना पड़ा। हलांकि, वो सक्रिय राजनीति का हिस्सा कभी नहीं बनीं और घर की देख-भाल में ज्यादा समय बिताती थीं। यही कारण है कि अखिलेश के साथ-साथ दोनों बच्चों की भी ज़िम्मेदारी उसी पर थी। मैं राजनीति करने लगा था और नेताजी का कामकाज भी संभालना मेरे लिए चुनौती थी। सरला को दो बार जिला सहकारी बैंक का राज्य प्रतिनिधि बनाया गया। 2007 के बाद लगातार दूसरी बार चुनी गई थी और अब कमान बेटे के हाथ में है।

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अरविंद यादव
वैसे परिवार की बात करें तो मुलायम सिर्फ अपने ही परिवार नहीं, चचेरे भाई प्रोफेसर रामगोपाल यादव के परिवार को भी पूरा संरक्षण देते रहते हैं। इसी क्रम में मुलायम की चचेरी बहन और रामगोपाल यादव की सगी बहन 72 वर्षीया गीता देवी के बेटे अरविंद यादव ने 2006 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और मैनपुरी के करहल ब्लॉक में ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए। अरविंद क्षेत्र की जनता में काफी पहचान रखते हैं। करहल में अरविंद ने समाजवादी पार्टी को काफी मजबूती दिलाई है। लेकिन  2011 के चुनाव में वह आजमाइश के लिए मैदान में नहीं उतर सके। कारण ये था कि इस चुनाव में करहल ब्लॉक प्रमुख की सीट सुरक्षित हो  चुकी थी। लेकिन अरविंद ने हार नहीं मानी है और इस समय वे मैनपुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाले करहल ब्लॉक में सपा की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं।
  
 
 
 

  
 
 
 
 

रविवार, 24 मार्च 2013

अब भविष्य गठबंधन सरकार का ही है: मुलायम


अब भविष्य गठबंधन सरकार का ही है: मुलायम

सांगली (महाराष्ट्र)/एजेंसी | Last updated on: March 25, 2013 12:30 AM IST
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future belongs to coalition govts says mulayam
समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव का कहना है कि एक पार्टी के राज करने का समय गुजर चुका है और अब भविष्य गठबंधन सरकार का ही है।
उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार देश की जरूरत है क्योंकि कोई एक पार्टी अकेले अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती।
सपा के 22 सांसदों ने कांग्रेस की अध्यक्षता वाली यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया हुआ है। उन्होंने कहा कि यह वह समय है जब एक जैसा लक्ष्य रखने वाली पार्टियां सामाजिक परिवर्तन के लिए एकजुट हो रही हैं।
महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसा दिखने को मिल रहा है। पश्चिमी महाराष्ट्र में वाल्वा गांव में स्वतंत्रता सेनानी और राज्य में सहकारिता आंदोलन के अग्रणी नागनाथ अन्ना नायकवडी की पहली पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने यहां आए थे।
1996 में रक्षा मंत्री रह चुके मुलायम ने रक्षा बजट के बढ़ाए जाने को किसानों की दुर्दशा से जोड़ा। उन्होंने कहा, ‘किसानों और कृषि सेक्टर का समर्थन करने वाला चीन भारत से कहीं आगे है। रक्षा बजट में हो रही बढ़ोत्तरी की वजह से किसानों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।
किसानों को सख्त रूप से समर्थन की जरूरत है।’ पार्टी संगठन के बारे में उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी अब सिर्फ सीनियरों की पार्टी नहीं रही है बल्कि इसमें युवा और महिलाएं भी शामिल हो रही हैं। यही वजह है कि अखिलेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।


प्रसंगवश ;
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इतिहास से -

.............जिन लोगों ने भी नेता जी को जाना है वह इस बात में यकीं रखते हैं की नेताजी जो कहते हैं वो करते भी हैं, जिन कारणों से नेता जी राजनितिक ऊँचाइयों को नहीं छू पाए उसमें उनके सहयोगियों की बहुत बड़ी साजिश भी रही है - बेनी प्रसाद से ही शुरू करता हूँ एक जमाने में नेताजी के सबसे करीबी हुआ करते थे और इस जोड़ी को लोग उम्मीदों के मशाल के रूप में देखते थे, पर बेनी बाबू अपनी कौम में ही अलोकप्रिय होते गए जिसका गुस्सा वे नेता जी पर उतारते फिर रहे हैं। दूसरे नंबर पर जनेश्वर मिश्र को लेता हूँ नेता जी ने उन्हें आजीवन सत्ता के करीब रखा पर वे कभी भी नेता जी को अपने से बड़ा नहीं होने दिए, उलटे अकेले में उनकी जीतनी निंदा हो सकती थी करते रहे और इस संघर्ष पुरुष के श्रम का प्रसाद वैसे ही खाते रहे जैसे मध्यकाल का द्विज बुद्धि के नाम पर शुद्र का माल उडाता रहा हो ! तीसरे नंबर पर भाई अमर सिंह सीधे सादे समाजवादी को जिन रंगारंग दुनिया की सैर कराई की ओ आम आदमी से दूर ही नहीं गायब हो गया - उन दिनों तो बस यही गीत याद आता था - अजीब दास्तान है ..... ! 

एक धूर समाजवादी को पूंजीपतियों की पंगत में बैठाने का अंजाम तो भाई अमर सिंह को ही दिया जाना चाहिए अन्यथा इस जन नायक को संपत्ति बनाने वालों से क्या मोह। तीसरा नेत्र अगर किसी ने खोला तो ओ भाई अमर सिंह ही थे, भला हो बहन जी का जिन्होंने इस दलाल की औकात समझी और वो भी दगा दे गयी श्धरती पुत्रश् को बहाना था की उनके लठैतों ने सर्किट हाउस में उनके साथ ‘लट्ठमार होली खेल ली’ फिर क्या था उनका भी विश्वास डगमगाया और चली गयी ‘राम दरबार में’ वहां उनका अभिनन्दन हुआ और इस कांड की महानायक बनाकर जलते हुए उत्तर प्रदेश की कुर्सीपर इन्हें विराजमान किया गया । भाई अमर सिंह पानी डालने के नाम पर समाजवाद का खून पीते रहे और अपनी धमनियों को मोटी करते रहे जिससे समाजवाद का गला घोंट सकें और गला घोंटते रहे - राज बब्बर, बेनी वर्मा, आजम खान, सिसकते रहे पर अमर भाई ‘कुतरते रहे’ क्या मजाल कोई बोलने की हिम्मत करे नेता से की ये कठफोरवा की तरह कुतर रहा है नेता जी की नियत को। 
छुटभइयों की क्या बिसात परिवार वालों की भी हिम्मत नहीं थी की भाई अमर सिंह के कर्मों पर कोई उंगली उठा सके। नेताजी को कहाँ पहुंचाकर आराम करने स्वदेश त्याग गए थे भाई अमर सिंह ‘दवाई’ का बहाना बनाकर । कारण पर मत जाइये ? 
कैसे भागे भाई जी आप सब जानते हैं ! 

लोग आते रहे लोग जाते रहे, लम्बी कहानी है कभी फिर लिखेंगे अभी तो (लिखना थोर समझना ढेर) 
भला हो बहन जी का वो सत्ता में आयीं और पूर्ण बहुमत से भाई अमर सिंह अपने ‘बिल’ में चले गए, समाजवाद - दलित और द्विज के आगे कमजोर पड़ गया, बहन जी ने सदियों की गुलामी का नामों निशाँ मिटाने का संकल्प लिया, पुराने घावों को यादकर इतिहास रचना आरम्भ किया राम मंदिर के बजाय उन्होंने आंबेडकर फुले कांशीराम और अपने स्मारक बनाने आरम्भ किये जिसे रोकने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत तक ने हस्तक्षेप किया पर इतिहास बनता गया ‘जिन्हें इतिहास बनाना आता है उन्हें दौलत की कमी नहीं पड़ती’ इस इतिहास रचने की प्रक्रिया में जो भी गलत हुआ उसपर विचार सदियाँ करेंगी अभी तो इतिहास के लिए काम हो रहा था. 
मिडिया, बुद्धिजीवी, द्विज द्रोह और सामन्तिओ को सत्ता पर कब्जे की प्रक्रिया के डर ने झकझोर दिया और ये जुट गए भाई अमर सिंह की तरह और जैसे भ्रष्टाचार की आंधी में नेता जी की सरकार चली गयी थी वैसे ही 2012 मे इतिहास रचने की प्रक्रिया रूक गयी। 
पर अभी खत्म नहीं हुयी है इतिहास तो इतिहास ही है कभी रूक जाता है कभी बनने लगता है । 

पर नेताजी मान रहे हैं अब सीनियर्स की ही राजनिती नहीं रही तो उन्हें शायद यह याद नहीं है कि जब वे राजनिती में आये थे तब वे भी युवा थे पर आज के जैसे युवा नहीं, इंदिराजी भी स्त्री थीं और युवा नेत्री भी, उनके विरोध का एक बड़ा कारण यह भी की वह नेहरू की पुत्री थीं और बहुत से अनुभवी कांग्रेसियों से आगे उन्हें ले जाया जा रहा था, तब भी इंदिरा जी को बड़ा किया जा रहा था देश को नहीं । अब भी वही हो रहा है बिलकुल निराले ढंग से । 

इस होली पर राहुल जी (राहुल सांकृत्यायन) याद आ रहे हैं - उनकी दो पुस्तकें 1.तुम्हारी क्षय हो 2.घुमक्कड शास्त्र . अकारण नहीं उन्होंने कहा होगा पहली किताब में वह लिखते हैं ‘जब जब पिछड़े या शुद्र सत्ता की तरफ बढ़ते नजर आते हैं तब तब ऊँची जातियों के लोग लोग देश बेच देते हैं या विदेशियों को सौंप देते हैं । दूसरी में लिखते हैं घर से निकलों जो और मिलेंगे वो भी अपने होते जायेंगे। आज हम इन दोनों बातों को यहाँ प्रसंगवश लाये हैं क्योंकि होली के अवसर पर यदि हम इस सच को स्वीकार कर पायेंगे की देश सबका है हमारा ही नहीं तभी हर आदमी इसे बनाने का प्रयास करेगा। 

नेताजी की चिंता कभी यह नहीं रही की फला ने कितना दगा दिया पर उन्हें हमेशा यह याद रहता है की किसने क्या किया। कहते हैं की नेता जी जरा कान के कच्चे हैं पर मैं ऐसा नहीं मानता, क्योंकि जबतक नेता जी के कान तक सच जाएगा नहीं तब तक झूठे नाना प्रकार के प्रचार करते रहेगें। इस बयां में भी वही सच्चाई है की ‘अब भविष्य गठबंधन सरकार का ही है-मुलायम। पर इस गठबंधन में होगा कौन ? 

दरअसल कितनी बड़ी विडम्बना है कि जब पिछड़ा बन रहा होगा तब दलित अलग हो जाएगा/कर दिया जाएगा, जब दलित बन रहा होगा तब पिछड़ा अलग हो जाएगा/कर दिया जाएगा,
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बुरा न मानंे ‘होली’ है। 
डा. लाल रत्नाकर
                 

सोमवार, 28 जनवरी 2013

मार्क्सवादी, न समाजवादी रामपुर में आजमवादी


मार्क्सवादी, न समाजवादी रामपुर में आजमवादी

 शुक्रवार, 2 मार्च, 2012 को 13:21 IST तक के समाचार
आज़म ख़ान
आज़म ख़ान एक समय समाजवादी पार्टी से निकाल दिए गए थे
साम्यवाद, मार्क्सवाद और समाजवाद तो सुना था लेकिन रामपुर में आजमवाद से भी पाला पड़ा. जवाद कमाल प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करते हैं और खुद को आजमवादी कहते हैं. आजमवादी यानी आजम खान के समर्थक.
वो कहते हैं, "मैं पहले आजमवादी हूं फिर समाजवादी. आज़म खान ने रामपुर में जितना काम किया है उतना किसी ने नहीं किया. हम मुश्किल में हैं और चाहते हैं कि सपा की सरकार बने."
लेकिन ये आजमवादी होना क्या है. कमाल बताते हैं कि आज़मवाद तब का शब्द है जब आजम खान को समाजवादी पार्टी से निकाल दिया गया था.
तो क्या ये सिर्फ एक शब्द मात्र है. वो कहते हैं, "नहीं नहीं जी. पूरा एक दल था नौजवानों का जो बनाया गया था आजमवादी युवा मंच. ये आजम के पुरजोर समर्थक थे और जब आजम अकेले थे तब हम सभी उनके साथ थे."
लेकिन वो तो प्रापर्टी डीलर हैं उनको तो कोई दिक्कत ही नहीं होगी. कमाल बताते हैं कि उनका धंधा पांच साल से मंदा चल रहा है.

पैसे का जोर

लेकिन क्यों, वो कहते हैं, "मैं ये बात इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैं सपा समर्थक हूं लेकिन सच यही है कि हमारे जैसे छोटे प्रॉपर्टी डीलरों का काम ठप हो गया है. जमीन खरीदने बेचने की डील पर विभाग में बहुत पैसा मांगा जाता है. हालात ये हैं कि कोई भी जमीन आपके नाम हो सकती है अगर आप पैसा खर्च करने को तैयार हों तो."
मैं कुछ समझा नहीं, कमाल ने कहा कि वो मेरे नाम पर रामपुर में जो जमीन चाहे लिखवा सकते हैं बस जमीन का हक लेना मेरा काम होगा यानी कार्यालयों में पैसे के ज़ोर पर सब कुछ हो रहा है.
"मैं ये बात इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैं सपा समर्थक हूं लेकिन सच यही है कि हमारे जैसे छोटे प्रॉपर्टी डीलरों का काम ठप हो गया है. ज़मीन खरीदने बेचने की डील पर विभाग में बहुत पैसा मांगा जाता है. हालात ये हैं कि कोई भी ज़मीन आपके नाम हो सकती है अगर आप पैसा खर्च करने को तैयार हों तो"
जवाद कमाल
रामपुर में काफी विकास हुआ है लेकिन लोग सरकार से नाराज हैं. इतना ही नहीं आज़म खान को सपा से निकाले जाने और फिर वापस लेने के प्रकरण ने उन्हें एक बड़े नेता के रूप में स्थापित तो कर ही दिया है.
लेकिन मुझे नहीं पता था कि आजम खान इतने बड़े नेता हो गए हैं कि लोहियावाद की तरह आजमवाद भी चले. रामपुर के लोगों के लिए मोहम्मद आजम खान उनके ही नहीं पूरी क़ौम के और देश के नेता हैं.
आजम खान वही नेता हैं जिन्हें कल्याण सिंह के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी से निकाला गया और बाद में मुलायम सिंह ने माफ़ी मांगकर उन्हें सम्मान से पार्टी में वापस लिया.

ताजमहल


ताजमहल गिराने के हिमायती आजम खान

 मंगलवार, 29 जनवरी, 2013 को 00:48 IST तक के समाचार
आजम खान
आजम खान पहले व्यक्ति नही हैं जिन्होंने ताजमहल के बारे इस तरह की आपत्ति दर्ज करायी है
उत्तर प्रदेश के नगर विकास, अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ, हज एवं संसदीय कार्यमंत्री मोहम्मद आज़म खान ने आगरा के ताजमहल को एक तरह से जनता की गाढ़ी कमाई और सरकारी खजाने का दुरूपयोग करार दिया है.
रविवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक सरकारी समारोह में भाषण देते हुए मोहम्मद आज़म खान ने 1992 के अपने पुराने बयान की याद दिलाई जब भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद के खिलाफ अभियान चला रहे थे.
उन्होंने अपना पुराना बयान दोहराते हुए कहा, "अगर लोग मस्जिद के बजाय ताजमहल गिराने चलें तो मैं उनसे आगे चलूँगा. इसलिए कि किसी भी हुक्मरान को आम आवाम के खजाने से अपनी महबूबा के लिए ताजमहल बनाने का हक नही दिया जा सकता.”
फिर उन्होंने शाहजाहाँ की तुलना मायावती से की और कहा कि अगर शाहजहां को यह हक नही दिया जा सकता तो फिर "मायावती को भी सरकारी खर्चे से अपनी मूर्ति लगाने का हक नही दिया जा सकता.”
याद दिला दें कि मायावती ने अपने साथ राजनीतिक गुरु कांशी राम की मूर्ति भी सरकारी खजाने से लगवाई थी.
याद दिला दें कि इससे पहले सन 2005 में जब शिया और सुन्नी समुदाय ने ताजमहल पर अपना मालिकाना हक़ जताया था तो उस समय आजम खान ने ताज महल को दो कब्रों वाला कब्रिस्तान बताया था.
लेकिन आजम खान कोई पहले व्यक्ति नही हैं जिन्होंने ताजमहल के बारे इस तरह की आपत्ति दर्ज करायी हो.
कभी साहिर लुधियानवी ने लिखा था, “इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम ग़रीबों की मोहब्बत का उडाया है मजाक.”
वैसे शाहजहां के जमाने में भले ताज सरकारी खजाने की फिजूल खर्ची रहा हो, मगर अब तो ताजमहल से सरकार की कमाई भी होती है.
उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले साल ताजमहल के टिकट से 70 करोड की कमाई हुई थी.

रविवार, 20 जनवरी 2013

महिला सशक्तिकरण और राजनीती


महिला सशक्तिकरण और राजनीती, मंत्री जी बहुत साफ कहते हैं, सो इन्होने असली बात कह ही दी .

हीरावती यादव ने ब्लाक प्रमुख का पद संभाला

Jaunpur | Last updated on: January 21, 2013 5:30 AM IST
बरसठी। ब्लाक परिसर में आयोजित भव्य समारोह में कैबिनेट मंत्री पारसनाथ यादव की पत्नी हीरावती देवी ने क्षेत्र पंचायत प्रमुख का पद संभाल लिया। शाही अंदाज में हीरावती की ताजपोशी हुई। जिले के सभी प्रमुख लोग हीरावती के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बने। मुख्य अतिथि मंत्री पारसनाथ यादव की मौजूदगी में हीरावती ने नई जिम्मेदारी संभाली। चार जनवरी को क्षेत्र पंचायत के उपचुनाव में हीरावती देवी निर्विरोध ब्लाक प्रमुख निर्वाचित घोषित की गई थीं। एसडीएम मड़ियाहूं शारदा प्रसाद यादव ने पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई।
पशुधन एवं लघु सिंचाई मंत्री पारसनाथ यादव ने शपथ ग्रहण समारोह में कहा कि क्षेत्र की जनता यदि संघर्ष करती है तो क्षेत्र का विकास स्वयं हो जाता है। जनता को संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। मंत्री ने कहा कि वह कारोगांव में पैदा हुए लेकिन विधानसभा से लेकर संसद तक लोग उन्हें निगोह का निवासी समझते हैं। यह क्षेत्र के लोगों के लिए गर्व की बात है। बरसठी को माडल ब्लाक बनाने का वादा किया। यह बरसठी के लिए संयोग की बात होगी कि इस बार ब्लाक प्रमुख हीरावती देवी, मंत्री जगदीश सोनकर, सांसद तूफानी सरोज और वह खुद इसी क्षेत्र से आते है। मंत्री जगदीश सोनकर, सांसद तूफानी और ब्लाक प्रमुख हीरावती का यह निर्वाचन क्षेत्र है। हम इसी क्षेत्र के निवासी हैं। यह इस ब्लाक के लिए बड़ा संयोग है। मंत्री ने कहा कि हर अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाएं। संघर्ष का मतलब खूनी संघर्ष से कतई नहीं। अपनी बात शालीनता से कहनी चाहिए। बरसठी की माटी सवर्णों की धरती है। सभी को मिलकर विकास करना है। समता और समानता के आधार पर ही विकास होगा। 
मंत्री ने कहा कि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी सिंचाई समस्या है। सरकार सिंचाई संसाधनों को दुरुस्त कर रही है। यदि कहीं पानी नहीं पहुंचे तो तुरंत बताएं। इस दौरान सांसद तूफानी सरोज, राज्यमंत्री जगदीश सोनकर, सपा जिलाध्यक्ष राज बहादुर ने भी अपनी बात रखी। बीडीओ डा. दयाराम विश्वकर्मा तथा पशु चिकित्साधिकारी डा. अजय ने अंगवस्त्रम भेंटकर सम्मानित किया। संचालन बीडीओ डा. डीआर विश्वकर्मा ने किया। इस दौरान मड़ियाहूं विधायक श्रद्धा यादव, जफराबाद विधायक शचींद्र नाथ त्रिपाठी, पूर्व विधायक लाल बहादुर यादव, जावेद अंसारी, लकी यादव, सुरेंद्र यादव, सिकंदर अली, लाले यादव, नीलू सिंह, अरुण सिंह, सुधाकर दीक्षित, बाबा राम चौरसिया, राकेश सिंह, शेषनाथ यादव, भूपेश पांडेय, रमेश यादव, अयोध्या मिश्र, जितेंद्र सिंह, जगदीश गौतम, कर्मानंद यादव, चंदा सिंह आदि मौजूद थे।
बेटा खेवेगा ब्लाक प्रमुखी 
पशुधन एवं लघु सिंचाई मंत्री पारसनाथ यादव ने कहा कि आपकी प्रमुख केवल दस्तखत बनाना जानती हैं। इस नाते ब्लाक प्रमुख की मदद बड़ा बेटा लकी यादव करेगा। मंत्री ने बड़े साफ शब्दों में बता दिया कि ब्लाक प्रमुखी तो लकी यादव ही चलाएंगे।

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

मुलायम की सरकार से नाराजगी बरकरार


मुलायम की सरकार से नाराजगी बरकरार

लखनऊ [जाब्यू]। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की सरकार से नाराजगी बरकरार है। गुरुवार को पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कई मंत्रियों की मौजूदगी में फिर अपना असंतोष जाहिर किया।
मुलायम ने कहा सरकार से जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो रही है। लोगों की समस्याएं नहीं सुलझायी जा रही है। कुछ लोग ऐसे हैं जो जनता के काम छोड़ और सारे काम कर रहे है। राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने जोड़ा कि जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन के लोगों की भी सुनवाई नहीं हो रही है। मुख्यमंत्री और पार्टी प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भरोसा दिलाया कि एक हफ्ते के अंदर संगठन और सरकार दोनों में बदलाव दिखेगा।
बैठक में यह बात भी उभरी कि सरकार में नौकरशाही हावी है। मुख्यमंत्री सचिवालय के आदेशों पर भी अमल नहीं किया जा रहा है। यहां तक कहा गया कि केवल अफसरों के तबादलों से काम नहीं चलेगा, जो सही काम नहीं कर रहे हैं उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। राज्य कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के दिग्गज नेताओं ने स्वीकारा कि जनता के बीच सरकार को लेकर जो संदेश जाना चाहिए था वह नहीं जा सका है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में इसका नुकसान हो सकता है।
काम नहीं कर रहे तो हटाइए :
सरकार की ढिलाई की बात सामने आने पर सपा महासचिव नरेश अग्रवाल ने कहा कि काम नहीं हो रहा है यह कहने से बात नहीं बनेगी। अगर कोई मंत्री गड़बड़ है तो उसे बदल दीजिए। जो अफसर नहीं सुन रहे हैं, उन पर सख्त कार्रवाई करिए।
ब्यूरोक्रेसी में होगा बदलाव :
बैठक में बताया गया कि जल्द ही बड़े पैमाने में ब्यूरोक्रेसी में बदलाव होगा। खराब अधिकारियों को हटाया जाएगा। तर्क दिया गया कि अधिकारियों की कमी के कारण तमाम ऐसे अफसरों से काम चलाना पड़ रहा था जो बसपा के करीबी रहे थे। हाल ही में हुई प्रोन्नति से अब अधिकारियों की कमी दूर हो गयी है।
मुलायम ने दिया मंत्र :
मुलायम ने अखिलेश को मंत्र दिया कि मुख्यमंत्री की सफलता में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, मुख्यमंत्री सचिवालय, इंटेलीजेंस प्रमुख और सूचना सचिव का काफी हाथ रहता है। ऐसे में इन पदों पर अच्छे और भरोसेमंद अफसर बहुत जरूरी होते हैं। यही अफसर मुख्यमंत्री के आंख-कान का काम करते हैं।
सरकार की ओर से संभाला मोर्चा :
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहां जल्द ही बदलाव दिखने की बात कही वहीं वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव व अहमद हसन ने मोर्चा संभालते हुए कहा कि सरकार संगठन की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी। तमाम चुनावी वादों को पूरा किया गया है और जो रह गए हैं वह भी जल्द पूरे किए जाएंगे।
युवा संगठनों को भंग करने से दिखे नाराज :
मुलायम इससे भी नाराज दिखे कि पार्टी के युवा संगठनों को भंग कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अच्छा होता कि जिन लोगों के खिलाफ शिकायत मिली थी, उन पर कार्रवाई की जाती।

शनिवार, 12 जनवरी 2013

समकालीन दौर की महिला नेत्रियाँ;

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
नई दिल्ली. देश की राजनीति में महिला नेताओं की खास जगह है। देश की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस से लेकर विपक्षी पार्टी बीजेपी की लोकसभा में नेता महिला ही हैं। लोकसभा अध्यक्ष के रूप में मीरा कुमार ने इतिहास रचा है। आइए, ऐसी कुछ महिला नेताओं के जीवन पर नज़र डालें, जो देश की राजनीति पर असर डाल रही हैं। 
 सोनिया गांधी 
 कांग्रेस और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी देश ही नहीं, दुनिया की सबसे ताकतवर महिला राजनेताओं में शुमार हैं। सोनिया गांधी ने अपने पति और देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के कुछ सालों बाद नेतृत्व के संकट से जूझ रही पार्टी की कमान अपने हाथों में ली और 2004 में उनकी ही अगुवाई में कांग्रेस ने एनडीए को केंद्र की सत्ता से बाहर किया। 2009 के आम चुनावों में उन्होंने फिर से लोकसभा का चुनाव जीता और केंद्र में सरकार बनाई। 'टाइम' मैगजीन उन्हें दुनिया के 100 सबसे ताकतवर लोगों में शुमार कर चुकी है। सोनिया गांधी दिल्ली में 10, जनपथ में रहती हैं। सोनिया लोकसभा में रायबरेली संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे आम तौर पर पत्रकारों को इंटरव्यू नहीं देती हैं। हाल ही में लोकसभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े बिल को जब समाजवादी पार्टी के सांसद ने फाड़ने की कोशिश की थी, तब सोनिया सांसद से उलझ गई थीं। राहुल गांधी सोनिया के बेटे हैं। सोनिया का जन्म 1946 में इटली में हुआ था। सोनिया गांधी राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा की मां हैं। 
 (तस्वीर: राजीव गांधी के साथ सोनिया गांधी) 
 
कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
सुषमा स्वराज 
 लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज मध्य प्रदेश की विदिशा लोकसभा सीट से सांसद हैं। उनका जन्म 1953 में हरियाणा के पलवल में हुआ था। सुषमा के पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे। छात्रा के रूप में सुषमा लगातार तीन साल तक हरियाणा राज्य में संस्कृत और हिंदी की सर्वश्रेष्ठ वक्ता चुनी गई थीं। सुषमा ने अंबाला कैंट के एसडी कॉलेज से बीए की डिग्री संस्कृत और राजनीति विज्ञान में ली। इसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई की और 1973 से सुप्रीम कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस शुरू कर दी। इसी दौरान सुषमा ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की सदस्यता भी ले ली। 1996 में वे दक्षिण दिल्ली संसदीय सीट से पहली बार लोकसभा में पहुंची थीं और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनी थीं। अक्टूबर, 1998 में वे दिल्ली की मुख्यमंत्री भी बनीं। लेकिन कुछ ही महीनों में प्याज की ऊंची कीमत जैसे मुद्दे के चलते बीजेपी की विधानसभा चुनाव में करारी हार हुई और वे फिर से राष्ट्रीय राजनीति में लौट आईं। 1999 में सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी को कर्नाटक की बेल्लारी सीट पर लोकसभा चुनाव में चुनौती दी थी, लेकिन इसमें उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। बाद में सुषमा ने राज्यसभा सदस्य के तौर पर संसद में वापसी की और वाजपेयी की सरकार में फिर से मंत्री बनीं। दिसंबर, 2009 में सुषमा लोकसभा में नेता, विपक्ष बनीं। सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल हैं। स्वराज सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
ममता बनर्जी 
 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। तीन दशकों से भी ज्यादा समय तक बंगाल पर राज करने वाले लेफ्ट को उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी भारतीय राजनीति में इतना प्रभाव रखती हैं कि देश के इतिहास में पहली बार एक रेलमंत्री को रेल बजट पेश करते ही मंत्रालय से बाहर करवा देती हैं। अमेरिका की 'टाइम' मैगज़ीन ममता बनर्जी को विश्व के 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्तियों में शुमार कर चुकी है। 'टाइम' ने पिछले साल ममता बनर्जी को 92वें स्थान पर रखा था। ममता की तारीफ में पत्रिका ने लिखा, ‘सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए मशहूर नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी। सड़क पर उन्होंने वामपंथियों को पटखनी दी।’ अपने समर्थकों के बीच ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के आलोचक उन्हें अस्थिर मानसिकता वाली नेता कहते हैं। ममता बनर्जी को अक्सर बेहद सादी सूती साड़ी और हवाई चप्पल में देखा जाता है। उनके हाथ में एक कपड़े का थैला होता है और वे जब भी दिल्ली आती हैं तो उन्हें मारुति कार में आते-जाते देखा जाता है। ममता बनर्जी अपने तेवरों के लिए जानी जाती हैं। ममता ने बंगाल की अनदेखी पर रेलमंत्री रामविलास पासवान पर अपनी शाल फेंक दी थी और समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर भी पकड़ लिया था। ममता बनर्जी का जन्म 1955 में हुआ था। वे जब बहुत कम उम्र की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। ममता बनर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एलएलबी और एजुकेशन में डिग्री हासिल की है। ममता ने 1970 में कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआती की थी। 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
मायावती 
 देश में दलितों की सबसे बड़ी नेता के तौर पर मायावती स्थापित हो चुकी हैं। वे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव उन्हें 'लोकतंत्र का चमत्कार' कहते थे। देश के सबसे अहम राजनीतिक सूबे में बीजेपी औऱ कांग्रेस जैसी पार्टियों को पीछे छोड़कर मायावती की बीएसपी को मौजूदा समय में नंबर दो की पोजिशन हासिल है। मायावती के समर्थक उन्हें ‘बहनजी’ कहते हैं। 1956 में जन्मी मायावती के शुरुआती दिन दिल्ली की इंद्रपुरी कॉलोनी में गुजरे थे। उनके पिता प्रभु दयाल डाक विभाग में नौकरी करते थे। मायावती ने एलएलबी और बीएड की डिग्री ली है। वे कुछ दिनों तक टीचर भी रही हैं और उस दौर में वे आईएएस अधिकारी बनने के सपने देखा करती थीं। लेकिन कांशीराम से परिचय होने के बाद वे राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। उन्होंने बिजनौर से लोकसभा चुनाव लड़ा था, जहां उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन मायावती ने हार नहीं मानी और दलितों और शोषितों की आवाज बुलंद करती रहीं। कांशीराम के अस्वस्थ होने और बाद में उनके निधन के बावजूद मायावती ने बीएसपी का जनाधार बढ़ाया और पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली। उन्होंने पार्टी को 2007 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता दिलाई। हालांकि, यूपी की मुख्यमंत्री के तौर पर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के भी कई आरोप लगे हैं। 2009 के लोकसभा चुनावों में मायावती ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वे बीएसपी को ज़्यादा से ज़्यादा वोट के साथ जीत दिलवाएं ताकि उन्हीं के शब्दों में 'दलित की बेटी' यानी वे खुद प्रधानमंत्री बन सकें। इनदिनों मायावती सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी को आरक्षण दिए जाने की मांग उठा रही हैं।

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
उमा भारती 
 उमा भारती का जन्म 1959 में मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में हुआ था। बहुत ही कम उम्र में उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथों का पाठ शुरू कर दिया था। उनके पिता नास्तिक थे। जीवन के शुरुआती दौर में ग्वालियर की राजमाता विजयराजे सिंधिया ने उनकी सहायता की थी। साध्वी ऋतंभरा के साथ उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके बारे में कहा जाता है कि वे सिर्फ आठवीं कक्षा तक औपचारिक तौर पर पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन फर्राटे से अंग्रेजी और धारा प्रवाह हिंदी बोलती हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में रही थीं।  2003 के विधानसभा चुनाव में उनकी अगुवाई में बीजेपी को मध्य प्रदेश में तीन-चौथाई बहुमत मिला था। लेकिन 1994 में कर्नाटक के हुबली में हुए दंगे से जुड़े मामले को लेकर अगस्त, 2004 में उन्हें मध्य प्रदेश के सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद कुछ समय बाद उन्होंने भाजपा छोड़ दी थी और भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। लेकिन जून, 2011 में वे फिर से बीजेपी में वापस आईं। 2012 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में उमा भारती ने बीजेपी की अगुवाई की थी। इन दिनों वे गाय और गंगा संरक्षण से जुड़े आंदोलनों का समर्थन कर रही हैं। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
वसुंधरा राजे  
राजस्थान की राजनीति में बड़ा नाम बन चुकीं वसुंधरा राजे का जन्म 1953 में मुंबई में हुआ था। वे विजयराजे सिंधिया और ग्वालियर के पूर्व महाराज जिवाजी राव सिंधिया की बेटी हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई तमिलनाडु के कोडाईकैनाल के एक कॉन्वेंट स्कूल में हुई। वसुंधरा ने मुंबई के सोफिया कॉलेज से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने 1982 में राजनीति में कदम रखा था। 1985 में वे पहली बार राजस्थान विधानसभा में बतौर विधायक पहुंची थीं। अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में वे केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं। वसुंधरा के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी अगुवाई में बीजेपी ने 2003 में राजस्थान विधानसभा में बड़ी जीत दर्ज की थी। वसुंधरा के कार्यकाल में राजस्थान में बुनियादी ढांचे का विकास किया गया, लेकिन जातीय हिंसा के दाग भी उनकी सरकार पर लगे। 2013 में राजस्थान में फिर से विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार के तौर पर फिर उभरेंगी। वसुंधरा की शादी धौलपुर के शाही परिवार के हेमंत सिंह से 1972 में हुई थी। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही दोनों अलग हो गए थे। वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़ सीट से लोकसभा के सदस्य हैं। 
कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
जयललिता 
 तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता का जन्म 1948 में एक तमिल परिवार में हुआ था। जयललिता के दादा मैसूर रियासत में सर्जन थे। जयललिता जब दो वर्ष की थीं, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद जयललिता अपनी मां के साथ बेंगलुरु चली गईं। इस बीच, जयललिता की मां ने तमिल सिनेमा में संध्या नाम से अभिनय भी शुरू कर दिया। बेंगलुरु में जयललिता ने बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद उनकी पढ़ाई-लिखाई चेन्नई में हुई। इसके बाद जयललिता ने तमिल और तेलुगु की कई फिल्मों में बतौर हीरोइन काम किया। वे धर्मेंद्र के साथ एक हिंदी फिल्म में भी काम कर चुकी हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें एमजी रामचंद्रन राजनीति में लेकर आए थे। लेकिन इस बात को जयललिता नकारती रही हैं। उनके समर्थक उन्हें 'अम्मा' कहते हैं। रामचंद्रन के निधन के बाद जयललिता ने खुद को एमजीआर की उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उनकी अगुवाई में एआईएडीएमके ने डीएमके को विधानसभा चुनाव में करारी मात दी है। यूपीए सरकार को समर्थन देने वाली डीएमके के अगुवा करुणानिधि जयललिता के सबसे बड़े विरोधी हैं। इन दिनों जयललिता यूपीए सरकार का कई मुद्दों पर विरोध कर रही हैं। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
हरसिमरत कौर बादल 
 अकाली दल बादल की लोकसभा सांसद हरसिमरत कौर बादल पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की बहू और सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हैं। हरसिमरत का जन्म 1966 में हुआ था। हरसिमरत ने टेक्सटाइल डिजाइन में ग्रैजुएशन किया है। 2009 के लोकसभा चुनाव में हरसिमरत कौर बादल ने भठिंडा संसदीय सीट पर कांग्रेस के रनिंदर सिंह को पराजित किया था। हरसिमरत संसद में 1984 के सिख दंगों के मुद्दे को जोर-शोर से उठा चुकी हैं। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ 'नन्हीं चान' नाम के आंदोलन की अगुवाई की थी। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
स्मृति ईरानी 
 बीजेपी की नेता और अभिनेत्री स्मृति ईरानी का जन्म 1972 में एक पंजाबी पिता और बंगाली मां के घर हुआ था। उनके पिता एक कूरियर कंपनी चलाते थे। उन्हें सबसे बड़ी पहचान टीवी सीरियल 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में तुलसी के किरदार से मिली थी। स्मृति की शादी जुबिन ईरानी से हुई है। स्मृति 2003 में बीजेपी से जुड़ी थीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने चांदनी चौक संसदीय सीट से उन्हें पार्टी का टिकट दिया था। उनके खिलाफ कांग्रेस की ओर से कपिल सिब्बल चुनावी मैदान में थे। इस चुनाव में स्मृति को हार का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन इसके बावजूद वे पार्टी के लिए काम करती रहीं। 2010 में स्मृति को बीजेपी की महिला इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। अगस्त, 2011 में वे बीजेपी की ओर से राज्यसभा की सदस्य बनीं। संसद में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को वे प्रमुखता से उठाती रही हैं। इन दिनों वे टीवी पर बहुत कम दिखाई देती हैं और अक्सर उन्हें समाचार चैनलों पर गंभीर राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेते हुए देखा जा सकता है। हाल ही में उन्होंने कांग्रेस के संजय निरूपम के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी किया है। 

कितनी पढ़ी-लिखी हैं ममता-माया-जया? जानिए 10 महिला नेताओं के बारे में
अंबिका सोनी 
 अंबिका सोनी पूर्व केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री हैं। इन दिनों वे कांग्रेस संगठन में अहम कामकाज देख रही हैं। उन्हें सोनिया के सबसे करीबी नेताओं में शुमार किया जाता है। उनका जन्म 1942 में लाहौर में हुआ था। उनके पिता आईसीएस अफसर थे। अंबिका ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के इंद्रप्रस्थ कॉलेज से एमए की पढ़ाई की। उनकी शादी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी उदय सोनी से हुई थी। अंबिका ने 1969 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी।1975 में वे यूथ कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनी गई थीं और संजय गांधी के साथ पार्टी का कामकाज देखा करती थीं।1976 में वे पहली बार राज्यसभा पहुंची थीं।1998 में वे ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई थीं। 
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