आज़म ख़ान को दर्जनों मुकदमों, बार-बार की गिरफ्तारी और वर्षों की कैद को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
(AI content की फेसबुक वाल से))
(02-11-2026 -1͏1͏h͏)
आज सुप्रीम कोर्ट ने आज़म ख़ान को ED द्वारा गिरफ़्तार किये जाने पर ज़मानत की सुनवाई की उनकी याचिका स्वीकार कर ली है, हो सकता है कि अदालत से उन्हें ज़मानत मिल जाए लेकिन क्या सरकार उन्हें जेल से बाहर रहने देगी?
उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकारों से अब यह सवाल खुलकर पूछा जाना चाहिए।
29 अक्टूबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो पैन कार्ड वाले मामले में उनकी सज़ा निलंबित करके ज़मानत दी। 31 अक्टूबर को वे रामपुर जेल से बाहर निकले और ED ने गिरफ्तार कर लिया। एक मामले में राहत मिली, दूसरे में फिर सलाखों के पीछे पहुँचा दिए गए। (theweek.in)
इस घटना को अकेले देखना अधूरी तस्वीर देखना होगा। पीछे की कहानी कहीं ज़्यादा गंभीर है।
मार्च 2021 में रामपुर पुलिस के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में भाजपा सरकार बनने के बाद आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ 81 मामले दर्ज हुए थे। यानी सरकार बदली और एक विपक्षी नेता के ख़िलाफ़ मुकदमों की बाढ़ आ गई। (indianexpress.com)
सरकार कह सकती है कि पहले उनके प्रभाव के कारण पीड़ित शिकायत नहीं कर पाते थे। यह संभावना जाँची जा सकती है। लेकिन इसी तर्क के सहारे दर्जनों मुकदमों, बार-बार की गिरफ्तारी और वर्षों की कैद को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सरकार बताए कि उसके अपने प्रभावशाली नेताओं के ख़िलाफ़ शिकायतों पर भी पुलिस इतनी ही तत्परता दिखाती है? क्या उनके पुराने मामलों की फाइलें भी इसी उत्साह से खुलती हैं? क्या उनके परिवारों पर भी प्रशासन का पूरा ज़ोर इसी तरह लगाया जाता है?
आज़म ख़ान के मामले में प्रशासन की भूमिका पर सवाल महज़ राजनीतिक आरोप नहीं हैं।
सिक्किम कैडर के IAS अधिकारी आंजनेय कुमार सिंह फरवरी 2019 में रामपुर के जिलाधिकारी बनाए गए थे। वे यूपी में प्रतिनियुक्ति पर 2015 में ही आ गए थे। लेकिन रामपुर में उनकी तैनाती भाजपा सरकार में हुई और आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ कार्रवाई में उनकी अहम भूमिका रही। (indianexpress.com)
अब उस मामले को याद कीजिए जिसकी सज़ा के बाद आज़म ख़ान की विधानसभा सदस्यता चली गई थी।
अक्टूबर 2022 में हेट स्पीच के मामले में सज़ा हुई। सदस्यता गई। सीट खाली हुई। उपचुनाव हुआ। भाजपा जीत गई। फिर मई 2023 में अपीलीय अदालत ने उसी मामले में आज़म ख़ान को बरी कर दिया। (indianexpress.com)
तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था।
उस फैसले में अदालत ने शिकायतकर्ता और चुनाव अधिकारी अनिल कुमार चौहान के उस बयान पर भी विचार किया कि उन्होंने तत्कालीन जिलाधिकारी के दबाव में शिकायत की थी। जिलाधिकारी ने पक्षपात से इनकार किया, लेकिन अदालत के सामने आए इस बयान को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? (indianexpress.com, indianexpress.com)
एक मुकदमा किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की सदस्यता छीन लेता है। उसके निर्वाचन क्षेत्र में नया चुनाव हो जाता है। बाद में दोषसिद्धि पलट जाती है। इस बीच जो जनादेश उलट चुका, उसका क्या? उस राजनीतिक क्षति की जवाबदेही किसकी है?
2022 में सुप्रीम कोर्ट के सामने भी उनकी स्वतंत्रता का ऐसा ही प्रश्न उठा था। अन्य 87 मामलों में ज़मानत मिलने के बाद एक पुराने मामले में उन्हें लगभग एक वर्ष सात महीने की देरी से आरोपी बनाया गया। अदालत ने विशेष परिस्थितियों और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को देखते हुए अनुच्छेद 142 के तहत अंतरिम ज़मानत दी थी। (indianexpress.com)
इसलिए आज की गिरफ्तारी पर सवाल उठाने वालों से यह कहना पर्याप्त नहीं कि “दूसरा मामला है।”
दूसरा मामला है, तो यह भी बताइए कि गिरफ्तारी उसी समय क्यों आवश्यक हुई?
ED की जाँच करीब सात साल पुरानी है। हाल के महीनों में इस मामले में छापे पड़े, जेल में पूछताछ हुई और विश्वविद्यालय की संपत्ति की अस्थायी कुर्की भी हुई। लेकिन जब पूछताछ जेल के भीतर हो सकती थी, तो रिहाई के ठीक समय दोबारा गिरफ्तारी के लिए कौन-सी नई परिस्थिति पैदा हुई? सरकार और एजेंसी पर इसकी जवाबदेही बनती है (theprint.in, m.economictimes.com)।
आज़म ख़ान के हर बयान, हर फैसले या उनकी पूरी राजनीति का समर्थन करना ज़रूरी नहीं है। किसी वास्तविक पीड़ित की शिकायत दबाई गई हो तो उसे न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन न्याय के नाम पर सरकार को किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की स्वतंत्रता अनिश्चितकाल तक छीनते रहने की छूट भी नहीं दी जा सकती।
मुकदमों की संख्या अपराध का प्रमाण नहीं होती। मुकदमे दर्ज करने की शक्ति उसी पुलिस और प्रशासन के पास है, जिसकी निष्पक्षता पर यहाँ सवाल उठ रहा है।
सत्ता परिवर्तन के बाद मुकदमों की असाधारण वृद्धि, प्रशासनिक दबाव पर अदालत में उठे प्रश्न, दोषसिद्धि पलटने से पहले हो चुका राजनीतिक नुकसान और ज़मानत के बाद फिर गिरफ्तारी—यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका का गंभीर आधार है।
किसी व्यक्ति को मुकदमा लड़ते-लड़ते बूढ़ा कर देना, उसके परिवार और संस्थाओं को लगातार कानूनी लड़ाइयों में उलझाए रखना और हर राहत के बाद कैद का नया रास्ता खोल देना—ऐसी प्रक्रिया खुद सज़ा बन सकती है।
लोकतंत्र में सरकार की ताक़त उसके विरोधी को कुचल सकने से नहीं मापी जाती। उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कटु विरोधी के संवैधानिक अधिकारों की कितनी रक्षा करती है।
आज़म ख़ान के मामले में कठघरे में उनकी जवाबदेही के साथ सरकार की निष्पक्षता भी है। और सरकार से सवाल पूछना किसी आरोपी का अपराध माफ़ करना नहीं, सत्ता को उसकी संवैधानिक सीमा याद दिलाना है।

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